लघु कथा -84

शहर के बीचों-बीच एक साफ़-सुथरे घर में रिया रहती थी। बाहर से देखने पर उसकी ज़िंदगी परफेक्ट लगती थी। वह अपने ऑफिस में बहुत मेहनती थी, काम समय पर और बेहतरीन ढंग से करती। बॉस उसकी तारीफ़ करते नहीं थकते। घर में वह शानदार खाना बनाती—उसके हाथ के बने पकवानों की खुशबू पड़ोस तक फैल जाती। रिश्तेदार कहते, “ऐसी बहू किस्मत वालों को मिलती है।”
रिया बातचीत में भी माहिर थी। पड़ोस की खबरें, रिश्तों की बातें, किसके घर क्या चल रहा है—सब उसे पता रहता। लोग कहते, “इसके बिना कॉलोनी की खबर अधूरी है।” अपने पति अमित के साथ भी वह बाहर से बहुत अच्छी दिखती—हँसती, साथ घूमती, सबके सामने आदर्श पत्नी बनकर रहती। लोग सोचते—काम में अच्छी, घर में अच्छी, रिश्तों में अच्छी—कितनी संपूर्ण स्त्री है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक दरार थी—और वह थी उसका सच।
अमित उस पर पूरा भरोसा करता था। उसे लगता था कि उसकी पत्नी हर बात में सच्ची है। पर रिया कई बातों में झूठ बोलती थी—कहाँ जा रही है, किससे मिल रही है, क्या सोच रही है—इन सबमें वह सच छुपा लेती। वह बाहर से जितनी मीठी थी, भीतर उतनी ही दोहरी।
कभी कहती—“ऑफिस का काम है,”
तो कभी—“दोस्तों से मिलना है,”
पर असल बात कुछ और होती।
उसे लगता था—अगर सच बोलूँगी तो झगड़ा होगा, सवाल होंगे, रोक-टोक होगी। इसलिए उसने झूठ को आसान रास्ता बना लिया। शुरू में झूठ छोटा था, फिर बड़ा होता गया। धीरे-धीरे वह अपनी ही बनाई हुई कहानी में फँस गई।
अमित को शक नहीं था, लेकिन दूरी महसूस होने लगी। पहले वे हर बात साझा करते थे, अब बातें सतह पर रह जातीं। अमित पूछता—
“तुम पहले जैसी क्यों नहीं रहीं?”
रिया मुस्कराकर टाल देती—
“काम ज़्यादा है।”
एक दिन अमित ने अचानक रिया की कही बातों में फर्क पकड़ लिया। एक झूठ, फिर दूसरा, फिर तीसरा। उसने सीधे सवाल किया। रिया पहले चुप रही, फिर बोली—
“मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती थी, इसलिए सच नहीं कहा।”
अमित की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा—
“तुमने मुझे दुख से नहीं, झूठ से तोड़ा है। अगर सच कहती, तो शायद हम साथ मिलकर हल निकाल लेते।”
उस दिन रिया पहली बार समझी—
काम में अच्छा होना,
घर में अच्छा होना,
बातों में अच्छा होना—
सब कुछ होते हुए भी,
अगर रिश्ते में सच नहीं है,
तो वह रिश्ता खोखला है।
उसे याद आया—कितनी बार उसने झूठ को सुविधा समझा, पर वह धीरे-धीरे ज़हर बन गया। उसने अमित के सामने सिर झुका दिया। बोली—
“मैं सब कुछ अच्छा करना चाहती थी, बस सच से डर गई।”
अमित ने कहा—
“सच कभी रिश्ता नहीं तोड़ता,
झूठ तोड़ता है।”
रिया ने उस दिन तय किया—अब चाहे मुश्किल हो, सवाल हों, बहस हो—पर वह सच बोलेगी। क्योंकि उसने देख लिया था—
सब कुछ अच्छा होते हुए भी,
अगर रिश्ते में ईमानदारी नहीं,
तो वह रिश्ता
बस दिखावा बनकर रह जाता है।

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Rajeev Verma

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