लघु कथा -83

छोटे से गाँव में कृष्णा नाम का लड़का रहता था। उसके पिता किसान थे और माँ सिलाई का काम करती थीं। घर की हालत साधारण थी, पर सपने बड़े थे। कृष्णा पढ़ाई में ठीक-ठाक था, मगर एक कमी थी—उसे खुद पर भरोसा नहीं था। हर काम से पहले वह सोचता, “मैं नहीं कर पाऊँगा।”
स्कूल में जब भी शिक्षक कोई सवाल पूछते, कृष्णा को जवाब पता होता, फिर भी वह हाथ नहीं उठाता। डर लगता—अगर गलत हो गया तो सब हँसेंगे। दोस्त उसे समझाते—
“तू कर सकता है।”
लेकिन उसका दिल मानता ही नहीं था।
एक दिन स्कूल में भाषण प्रतियोगिता हुई। शिक्षक ने कृष्णा का नाम लिख दिया। कृष्णा घबरा गया। घर आकर बोला—
“माँ, मैं मंच पर नहीं बोल पाऊँगा।”
माँ ने प्यार से कहा—
“बेटा, कोशिश किए बिना हार मत मानो। भगवान ने तुम्हें दिमाग दिया है, आवाज़ दी है, तो उनका इस्तेमाल भी करो।”
कृष्णा ने तैयारी तो की, पर मन में डर बना रहा। मंच पर पहुँचा तो हाथ काँपने लगे, आवाज़ लड़खड़ा गई। लोग फुसफुसाने लगे। वह बीच में ही रुक गया। प्रतियोगिता हार गया, और खुद से और नफ़रत करने लगा।
उसी शाम गाँव के बुज़ुर्ग मास्टरजी उससे मिलने आए। बोले—
“बेटा, सफलता एक वाहन है जो कर्म के पहियों पर चलता है, लेकिन आत्मविश्वास के ईंधन के बिना वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता।”
कृष्णा चुपचाप सुनता रहा।
मास्टरजी ने कहा—
“मेहनत तो तू करता है, पर भरोसा नहीं करता। अपने आप पर विश्वास करना भी एक अभ्यास है।”
अगले दिन से कृष्णा ने छोटा-सा नियम बनाया—
हर दिन कोई एक काम बिना डरे करेगा।
पहले दिन शिक्षक से सवाल पूछा।
दूसरे दिन कक्षा में पढ़कर सुनाया।
तीसरे दिन दोस्तों के सामने कविता बोली।
हर बार डर लगा, पर उसने किया। धीरे-धीरे डर कम होने लगा।
कुछ महीनों बाद फिर भाषण प्रतियोगिता हुई। इस बार कृष्णा ने खुद नाम लिखवाया। मंच पर गया तो दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, पर उसने मन से कहा—
“डर के साथ भी बोल सकता हूँ।”
उसने बोलना शुरू किया। आवाज़ पहले काँपी, फिर मज़बूत हो गई। लोग ध्यान से सुनने लगे। तालियाँ बजीं। वह प्रतियोगिता जीत गया।
घर आकर उसने माँ से कहा—
“माँ, मैं डरता अब भी हूँ, पर अब डर मुझे रोकता नहीं।”
माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे।
सालों बाद कृष्णा बड़ा अफ़सर बना। गाँव लौटा तो बच्चों से बोला—
“मेहनत बहुत ज़रूरी है, पर अगर खुद पर भरोसा नहीं होगा, तो मेहनत रास्ते में ही रुक जाएगी।”
फिर उसने वही बात दोहराई जो मास्टरजी ने कही थी—
“सफलता एक वाहन है जो कर्म के पहियों पर चलता है, लेकिन आत्मविश्वास के ईंधन के बिना यात्रा करना असंभव है।”

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Rajeev Verma

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