लघु कथा -82

छोटे से शहर में हरि नाम का एक साधारण आदमी रहता था। उसकी ज़िंदगी बहुत साधारण थी—सुबह दुकान खोलना, शाम को घर लौटना और रात को भगवान के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाना। हर दिन वह बस एक ही प्रार्थना करता—
“जो ठीक लगे, वही देना प्रभु। हमारा क्या है, हम तो कुछ भी माँग लेते हैं।”
लोग उसे समझाते—
“कुछ तो माँगा कर—पैसा, तरक्की, बड़ा घर।”
हरि मुस्कराकर कहता—
“मुझे नहीं पता मेरे लिए क्या ठीक है। वह जानता है।”
एक दिन हरि को शहर के बड़े व्यापारी ने साझेदारी का प्रस्ताव दिया। मुनाफा बहुत था, लेकिन तरीका थोड़ा गलत। हरि का मन डगमगाया। रात को वह मंदिर गया और बोला—
“प्रभु, अगर यह रास्ता मेरे लिए ठीक है तो मन को शांति देना, अगर गलत है तो इसे मुझसे दूर कर देना।”
अगले ही दिन व्यापारी किसी घोटाले में पकड़ा गया। हरि समझ गया—जिसे वह “अवसर” समझ रहा था, वह दरअसल एक गिरावट थी।
कुछ समय बाद हरि की दुकान में आग लग गई। सब कुछ जल गया। लोग बोले—
“तू भगवान पर इतना भरोसा करता है, फिर यह क्यों हुआ?”
हरि की आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर वही बात—
“जो ठीक लगे, वही देना प्रभु।”
वह मजदूरी करने लगा। सुबह-शाम मेहनत करता। एक दिन उसी मेहनत के दौरान उसने एक बुज़ुर्ग को सड़क पर गिरते देखा। हरि ने उन्हें उठाया और अस्पताल पहुँचाया। पता चला वह बड़े उद्योगपति थे। उन्होंने हरि का नाम-पता लिख लिया।
कुछ महीनों बाद वही बुज़ुर्ग उसके पास आए। उन्होंने कहा—
“तूने बिना कुछ माँगे मेरी जान बचाई। अब मेरी कंपनी में तुझे काम देना मेरा कर्तव्य है।”
हरि को अच्छी नौकरी मिली। धीरे-धीरे उसने अपनी टूटी दुकान से भी बेहतर दुकान खोल ली। अब उसकी ज़िंदगी फिर से सँवर रही थी।
एक दिन हरि बीमार पड़ गया। डॉक्टर ने कहा—
“समय पर इलाज न होता, तो बचना मुश्किल था।”
हरि ने सोचा—
“अगर मैं उस आग में टूटकर बैठ गया होता, तो शायद इस इलाज तक पहुँच ही नहीं पाता।”
अब उसे समझ आने लगा—
कई बार जो हमें नुकसान लगता है,
वही हमें सही जगह तक ले जाता है।
एक शाम हरि मंदिर में बैठा था। उसने आँखें बंद कर कहा—
“प्रभु, आज समझ आया—मैं जो माँगता हूँ, वह हमेशा मेरे लिए ठीक नहीं होता। पर तू जो देता है, वही मेरे लिए सबसे अच्छा होता है।”
पास बैठा एक लड़का बोला—
“भैया, तुम भगवान से कुछ माँगते क्यों नहीं?”
हरि मुस्कराया—
“क्योंकि मैं नहीं जानता कि मेरे लिए क्या सही है। वह जानता है। मेरा काम है भरोसा करना।”
उस दिन हरि को लगा कि उसके पास बहुत कुछ है—
शांति, संतोष और विश्वास।
और उसने मन ही मन फिर कहा—
“जो ठीक लगे, वही देना प्रभु।
हमारा क्या है, हम तो कुछ भी माँग लेते हैं।”

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Rajeev Verma

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