लघु कथा -81

रोहित हमेशा खुद को बहुत व्यस्त आदमी मानता था। उसे लगता था कि दुनिया उसी के काम से चल रही है। सुबह से रात तक दफ़्तर, मीटिंग, मोबाइल, मेल—बस यही उसकी ज़िंदगी थी। माँ-बाप, पत्नी, बच्चे और दोस्त—सब उसके लिए “कल” के लिए टाल दी जाने वाली बातें थीं।
माँ कहतीं—
“बेटा, कभी हमारे साथ बैठकर चाय तो पी लिया कर।”
रोहित हँसकर कहता—
“अभी टाइम नहीं है माँ, बाद में।”
दोस्त फोन करते—
“चल यार, पुराने दिनों की तरह बैठते हैं।”
रोहित जवाब देता—
“अगले हफ्ते पक्का।”
पत्नी कहती—
“बच्चे तुम्हें बहुत याद करते हैं।”
रोहित कहता—
“यह सब मैं उन्हीं के भविष्य के लिए तो कर रहा हूँ।”
समय ऐसे ही भागता गया। रोहित समझता रहा कि सब कुछ हमेशा उसके पास रहेगा।
एक दिन उसे अचानक बड़ी नौकरी का ऑफर मिला—दूसरे शहर में। उसने बिना सोचे हाँ कर दी। जाते वक्त माँ की आँखें नम थीं, पर रोहित ने ध्यान नहीं दिया। बच्चों ने उसका हाथ पकड़ा—
“पापा, जल्दी आना।”
वह मुस्कराकर चला गया।
नए शहर में वह और ज़्यादा व्यस्त हो गया। कॉल कम होते गए। घर से दूरी बढ़ती गई।
एक रात अचानक फोन आया। माँ अस्पताल में थीं। रोहित दौड़ता हुआ पहुँचा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। माँ की आँखें बंद थीं। वही माँ, जो हर दिन उसे चाय के लिए बुलाती थीं।
रोहित की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। उसे याद आया—कितनी बार उसने “बाद में” कहा था।
कुछ महीनों बाद उसके सबसे पुराने दोस्त की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। वही दोस्त, जो हर महीने मिलने बुलाता था। रोहित अंतिम संस्कार में खड़ा सोच रहा था—
“अगर एक बार भी चला गया होता…”
घर लौटा तो बच्चों में वह अपनापन नहीं रहा। वे उससे बात तो करते थे, पर दूरी थी। पत्नी ने धीरे से कहा—
“तुम हमारे साथ थे ही कहाँ?”
रोहित पहली बार समझा—
वक्त, दोस्त और परिवार मुफ्त में मिलते हैं,
लेकिन उनकी कीमत तब समझ आती है,
जब वे खो जाते हैं।
उसने फैसला किया—अब “बाद में” नहीं। उसने नौकरी बदली, घर के पास आ गया। अब वह हर शाम बच्चों के साथ खेलता, पत्नी के साथ चाय पीता और पिता के पास बैठकर बातें करता।
दोस्तों की कमी हमेशा खलती रही, पर उसने सीखा कि जो बचे हैं, उन्हें खोना नहीं है।
एक दिन वह अपने बेटे से बोला—
“बेटा, याद रखना—
पैसा बाद में कमाया जा सकता है,
लेकिन जो चला गया, वो वक्त, वो लोग, वो रिश्ते
फिर कभी नहीं लौटते।”
बेटा मुस्कराया और उसका हाथ पकड़ लिया।
रोहित ने उस पल महसूस किया—
अब वह सच में अमीर है,
क्योंकि उसके पास
वक्त है,
अपनों का साथ है,
और दिल से निभाए जाने वाले रिश्ते हैं।
और उसने मन ही मन कहा—
“काश, यह कीमत मैंने
खोने से पहले समझ ली होती…”

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Rajeev Verma

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