लघु कथा -80

रामपुर कस्बे में दो भाई रहते थे—रमेश और सुरेश। दोनों एक ही माँ-बाप की संतान थे, एक ही घर में पले-बढ़े, पर स्वभाव में ज़मीन-आसमान का अंतर था। रमेश शांत, मददगार और ईमानदार था, जबकि सुरेश चालाक, लालची और स्वार्थी।
पिता अक्सर कहते थे—
“बेटा, आदमी की अच्छाई और बुराई दोनों की कीमत होती है। फर्क बस इतना है कि अच्छाई की कीमत मिलती है और बुराई की कीमत चुकानी पड़ती है।”
रमेश यह बात दिल से मानता था, लेकिन सुरेश हँसकर टाल देता।
गाँव में एक बूढ़ी विधवा, काकी शारदा, अकेली रहती थीं। रमेश रोज़ उनके लिए दवा लाता, कभी लकड़ी काट देता, कभी सब्ज़ी पहुँचा देता। वह यह सब बिना किसी उम्मीद के करता था। शारदा काकी उसे दुआ देतीं—
“बेटा, तू बहुत आगे जाएगा।”
उधर सुरेश को सिर्फ़ अपना फायदा दिखता था। वह लोगों से झूठे वादे करता, उधार लेकर लौटाता नहीं, और मौका मिलते ही धोखा दे देता। उसे लगता था कि चालाकी से ही दुनिया जीती जाती है।
एक दिन कस्बे में एक बड़ी कंपनी का मालिक आया। उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत थी जो ईमानदार हों और काम में भरोसेमंद हों। उसने गाँववालों से पूछा—
“यहाँ सबसे सच्चा और नेक इंसान कौन है?”
लगभग सबने एक ही नाम लिया—रमेश।
रमेश को शहर में अच्छी नौकरी मिल गई। वह मेहनत करता गया और धीरे-धीरे तरक्की करता गया। उसने अपने माता-पिता का घर ठीक करवाया, गाँव के बच्चों के लिए किताबें भिजवाईं और शारदा काकी का पूरा इलाज करवाया।
लोग कहने लगे—
“देखो, अच्छाई की कीमत मिलती है।”
उधर सुरेश की हालत बिगड़ने लगी। जिन लोगों को उसने धोखा दिया था, वे एक-एक करके उससे हिसाब माँगने लगे। कुछ ने अदालत में केस कर दिया। कुछ ने गाँव में उसकी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी। अब कोई उस पर भरोसा नहीं करता था। जहाँ जाता, लोग कहते—
“इससे दूर रहो, यह धोखेबाज़ है।”
एक रात सुरेश रोता हुआ रमेश के पास आया। बोला—
“भैया, मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई। सब मुझसे नफ़रत करते हैं। कोई काम नहीं देता।”
रमेश ने उसका कंधा थामकर कहा—
“सुरेश, तूने बुराई चुनी, इसलिए अब उसकी कीमत चुका रहा है। लेकिन अभी भी देर नहीं हुई। अगर सच में बदलना चाहता है, तो आज से सही रास्ता चुन।”
सुरेश की आँखों में आँसू थे। उसने पहली बार समझा कि चालाकी से थोड़ी देर का फायदा मिल सकता है, लेकिन अंत में वही ज़हर बन जाती है। उसने रमेश के साथ रहकर मेहनत करना शुरू किया। धीरे-धीरे उसने लोगों से माफ़ी माँगी और अपने पुराने कर्ज़ चुकाने लगा।
समय लगा, लेकिन एक दिन लोगों ने फिर उस पर भरोसा करना शुरू किया।
सुरेश ने तब कहा—
“अब समझ आया, आदमी की अच्छाई और बुराई दोनों की कीमत होती है। फर्क बस इतना है कि अच्छाई की कीमत मिलती है, और बुराई की कीमत चुकानी पड़ती है।”

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Rajeev Verma

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