लघु कथा -94

पंजाब के लुधियाना जिले के एक छोटे से गाँव में हरप्रीत सिंह रहता था। उसके पिता किसान थे और माँ घर संभालती थीं। हरप्रीत पढ़ाई में ठीक था, पर बहुत संकोची। उसे हमेशा लगता था कि वह कुछ खास नहीं कर सकता। जब भी कोई उससे पूछता, “बेटा, आगे क्या बनोगे?” वह सिर झुका कर कह देता, “पता नहीं।”
पिता चाहते थे कि हरप्रीत इंजीनियर बने। उन्होंने खेत बेचकर उसकी पढ़ाई के लिए पैसे जुटाए। शहर भेजते समय पिता ने कहा,
“बेटा, मेहनत करना। सफलता कर्म से मिलती है।”
हरप्रीत ने मन ही मन सोचा, “मेहनत तो कर लूँगा, पर क्या मैं सच में सफल हो पाऊँगा?”
कॉलेज में कई लड़के उससे ज्यादा तेज, ज्यादा बोलने वाले और ज्यादा आत्मविश्वासी थे। हरप्रीत मेहनत करता था, पर जब भी कोई प्रतियोगिता या प्रस्तुति होती, वह डर के मारे पीछे हट जाता। एक बार प्रोफेसर ने कहा,
“तुम मेहनती हो, पर तुम्हारे भीतर आत्मविश्वास की कमी है। बिना ईंधन के गाड़ी नहीं चलती।”
यह बात उसके दिल में बैठ गई।
एक दिन कॉलेज में स्टार्टअप प्रतियोगिता हुई। हरप्रीत के पास एक अच्छा विचार था—किसानों के लिए मोबाइल ऐप, जिससे वे सही दाम पर फसल बेच सकें। पर उसे लगा, “मेरे जैसे साधारण लड़के की बात कौन सुनेगा?” उसने फॉर्म भरने का मन बना ही लिया था, फिर फाड़ दिया।
उसी रात उसे पिता की याद आई—उनके खुरदरे हाथ, उनकी उम्मीद भरी आँखें। उसे लगा कि पिता ने केवल उसके कर्म पर भरोसा नहीं किया, उसके ऊपर भी भरोसा किया है। अगर वह खुद पर भरोसा नहीं करेगा, तो मेहनत भी बेकार हो जाएगी।
अगले दिन उसने फिर से फॉर्म भरा।
तैयारी के दिन बहुत मुश्किल थे। वह दिन-रात मेहनत करता, पर साथ ही आईने के सामने खड़े होकर बोलने का अभ्यास भी करता। शुरू में उसकी आवाज काँपती, पर धीरे-धीरे मजबूत होने लगी। वह खुद से कहता,
“मेहनत मेरे पहिए हैं, और आत्मविश्वास मेरा ईंधन।”
प्रतियोगिता के दिन उसका नाम पुकारा गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पर उसने गहरी साँस ली और मंच पर चढ़ गया। उसने अपने गाँव, अपने पिता और किसानों की मुश्किलों की बात की। फिर अपने ऐप का विचार बताया। इस बार वह नहीं डरा। वह बोलता गया, और शब्द खुद-ब-खुद रास्ता बनाते गए।
तालियाँ बजीं।
नतीजा आया—हरप्रीत दूसरा नहीं, पहला आया।
जब वह गाँव लौटा तो पिता ने उसे गले लगा लिया। पिता बोले,
“बेटा, तूने कमाल कर दिया।”
हरप्रीत की आँखों में आँसू आ गए।
“पिताजी, मैंने सीखा कि सिर्फ मेहनत काफी नहीं होती। मेहनत तो गाड़ी है, पर उसे चलाने के लिए आत्मविश्वास का ईंधन चाहिए।”
कुछ महीनों बाद उसका ऐप सच में किसानों के काम आने लगा। लोग अब उसे उदाहरण के रूप में देते। वही हरप्रीत, जो कभी खुद पर भरोसा नहीं करता था, अब दूसरों को सिखाता था—
“सफलता कर्म के पहियों पर चलती है, पर आत्मविश्वास के बिना वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती।”

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Rajeev Verma

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