लघु कथा-9

“ऐ दोस्त, मैंने दुनिया देखी है…”
यह वाक्य अर्जुन अक्सर खुद से कहता था, जैसे कोई पुराना गीत हो जो हर मोड़ पर उसके भीतर बज उठता हो।
अर्जुन कभी बहुत लोगों से घिरा रहता था। दोस्त, रिश्तेदार, सहकर्मी—हर जगह वही हँसी, वही मज़ाक। लेकिन जैसे-जैसे वह आगे बढ़ा, ज़िंदगी बदलती गई। उसने मेहनत की, अपने सपनों के पीछे चला, और धीरे-धीरे उसे समझ आया कि हर साथ चलने वाला, मंज़िल तक नहीं आता।
पहले जब वह “ना” कहना सीख रहा था, लोग नाराज़ होने लगे।
“अब तू बदल गया है।”
“पहले जैसा नहीं रहा।”
उसे अजीब लगता था—क्या बदल जाना इतना गलत है?
एक दिन अर्जुन ने महसूस किया कि उसके फोन में मैसेज कम हो गए हैं। कोई यूँ ही हाल पूछने वाला नहीं रहा। जो आते भी, किसी न किसी उम्मीद के साथ आते। कोई मदद चाहता, कोई फायदा। उसे समझ आ गया—जहाँ समझ नहीं, सिर्फ़ अपेक्षाएँ होती हैं, वहाँ रिश्ता बोझ बन जाता है।
उसने कुछ रिश्तों से दूरी बना ली। यह दूरी दर्द देती थी, लेकिन भीतर कहीं सुकून भी था। अब शामें शांत थीं। वह अकेले टहलता, आसमान देखता, और पहली बार अपनी ही आवाज़ साफ़ सुन पाता। उसे पता चलता कि वह क्या चाहता है, किससे खुश है, और किससे नहीं।
अकेलापन अब उसे सज़ा नहीं लगता था। यह उसका चयन था।
एक ऐसा चयन, जिसमें वह खुद के करीब था।
एक रात वह पहाड़ी पर बैठा था। शहर की लाइटें नीचे टिमटिमा रही थीं। उसे लगा—भीड़ हमेशा नीचे होती है। ऊपर हवा पतली होती है, रास्ता कठिन होता है, और लोग कम होते हैं। लेकिन जो दिखता है, वह बहुत साफ़ होता है।
उसी रात उसकी पुरानी दोस्त सिया का मैसेज आया—
“सब ठीक है? तुम बहुत चुप रहने लगे हो।”
अर्जुन ने लिखा—
“ऐ दोस्त, मैंने दुनिया देखी है।
ग्रोथ के साथ अकेलापन आता है।
ये अकेलापन सज़ा नहीं, मेरा चयन है।
मैं उन रिश्तों से दूर हो गया हूँ जहाँ समझ नहीं, सिर्फ़ उम्मीदें थीं।”
सिया ने पूछा—“दर्द नहीं होता?”
अर्जुन ने जवाब दिया—
“बहुत होता है।
लेकिन उस दर्द में मैं खुद को पाता हूँ।
वहीं मेरी आवाज़ मिलती है, वहीं मेरी दिशा बनती है।”
कुछ दिन बाद सिया उससे मिलने आई। उन्होंने ज़्यादा बातें नहीं कीं। बस साथ बैठे, चाय पी, और आसमान देखा। सिया बोली,
“तू बदल गया है… लेकिन अच्छा बदला है।”
अर्जुन मुस्कराया।
“नरम रहो, लेकिन दिशा मत बदलो—यही सीखा है मैंने।”
अब अर्जुन हर किसी से नहीं जुड़ता, लेकिन जिससे जुड़ता है, पूरे मन से जुड़ता है। वह जान गया है कि करुणा रखना ज़रूरी है, पर खुद को खोकर नहीं।
और जब कोई उससे पूछता है, “तू इतना अकेला क्यों रहता है?”
वह बस इतना कहता है—
“अकेला नहीं हूँ दोस्त…
मैं बस खुद के साथ हूँ।”

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Rajeev Verma

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