लघु कथा -79

अलोक का बचपन कभी आसान नहीं था। उसका घर हमेशा शोर और उलझनों से भरा रहता। छोटी उम्र में ही उसने देखा कि घर का माहौल तनावपूर्ण और असुरक्षित था। माता-पिता अक्सर अपने झगड़ों और गुस्से में इतने डूबे रहते कि उनका बच्चा अकेला और अनदेखा महसूस करता। अलोक समझ नहीं पाता था कि सही और गलत की सीमाएँ क्या हैं। उसका मन डर, उलझन और अकेलेपन से भरा रहता। रात को वह तन्हाई में उठकर सोचता—“क्या यही दुनिया है? क्या यही ज़िंदगी है?”
स्कूल में अलोक चुपचाप रहता। दोस्त उससे दूरी बनाने लगे, क्योंकि वह अक्सर अचानक गुस्सा कर देता था या कुछ अजीब व्यवहार करता। छोटे-छोटे कामों में वह बार-बार गलती करता और खुद को दोषी समझता। उसे यह समझ में नहीं आता था कि उसके भीतर का अराजकपन उसकी गलती नहीं, बल्कि घर के माहौल का परिणाम है। उसके भीतर डर और असहायपन धीरे-धीरे गुस्से में बदल गया।
किशोरावस्था में अलोक ने महसूस किया कि दुनिया उसके लिए कठोर है। उसे लगता कि कोई उसे समझ ही नहीं सकता। बार-बार वह सोचता—“क्या मैं भी वही बन जाऊँ जो मैंने देखा?” उसकी आँखों में सवाल और निराशा दोनों झलकते। कभी-कभी वह खुद से डरता—“अगर मैं वही करूँ जो मैंने देखा, तो क्या मैं भी सुरक्षित रह पाऊँगा?”
एक दिन स्कूल के शिक्षक ने उसे अकेले बुलाया। शिक्षक ने उसकी आँखों में देखा और धीरे से कहा,
“अलोक, मैं जानता हूँ कि तुम्हारे भीतर कितना दर्द है। बचपन जो भी था, वह तुम्हारी गलती नहीं। अब तुम्हारे हाथ में है अपने भविष्य को बनाने का अवसर।”
अलोक पहली बार किसी से खुलकर रोया। उसने सारी परेशानियाँ बताईं—अकेलापन, डर, भ्रम और गुस्सा। शिक्षक ने उसे समझाया कि हर इंसान में सुधार की क्षमता होती है।
“जो टूट गया, वह भी जोड़ सकता है। जो गिर गया, वह फिर से उठ सकता है। बस कदम बढ़ाना सीखो।”
अलोक ने अपने जीवन को बदलने का निश्चय किया। उसने पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया। पहले छोटे कामों से शुरुआत की—नोट्स बनाना, मेहनत करना, रोज़ाना समय पर उठना। धीरे-धीरे उसने सफलता की छोटी-छोटी सीढ़ियाँ चढ़ना शुरू किया। हर छोटी जीत ने उसके भीतर विश्वास जगाया। उसने अपने भीतर के डर और गुस्से को प्यार, समझ और संयम में बदलना शुरू किया।
समय बीता। अलोक ने खुद को साबित किया। अच्छे अंक पाए, नौकरी पाई और अपने जीवन में संतुलन स्थापित किया। उसने जाना—बचपन चाहे कितना भी कठिन क्यों न रहा हो, वह इंसान की ताक़त बन सकता है, बुराई नहीं। उसने सीखा कि चोटें हमें कमजोर नहीं बनातीं, बल्कि हमें मजबूत बनाकर आगे बढ़ने की ताक़त देती हैं।
आज अलोक दूसरों को भी यही सिखाता है—
“तुम्हारे बीते हुए कल ने तुम्हें चोट पहुंचाई हो, पर आने वाला कल तुम्हारा है। उसे सही दिशा में बनाना तुम्हारे हाथ में है। टूटना कोई अपराध नहीं, उठना ही असली जीत है।”
वह जान गया कि जीवन में सबसे बड़ी ताक़त यह है कि कोई इंसान अपने भीतर की चोटों को स्वीकार करे, उन्हें सीख में बदले और आगे बढ़े। वह न केवल अपने लिए बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया।
अलोक की कहानी बताती है कि टूटा हुआ बचपन भी, अगर सही दिशा मिले और समय पर सहारा मिले, तो इंसान को उसके सपनों तक पहुँचा सकता है।
हर चोट, हर डर और हर निराशा सिर्फ़ एक रास्ता है—उठने और मजबूत बनने का।

Published by

Unknown's avatar

Rajeev Verma

Thanks For watching. Note:- ALL THE IMAGES/PICTURES SHOWN IN THE VIDEO BELONGS TO ME. I AM THE OWNER OF ANY PICTURES SHOWED IN THE VIDEO ! DISCLAIMER: This Channel DOES NOT Promote or encourage Any illegal activities , neither any services of any child is taken in this video making, all contents provided by this Channel is meant for Sharing Knowledge and awareness for health only . Rajeev Verma #HealthyFeasting. I Loves to post videos on Preventive Health Maintenance Food Recipes. Subscribe my YouTube Channel NOW. http://www.youtube.com/c/HealthyFeasting

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.