लघु कथा-8

रवि बहुत कम बोलता था, लेकिन बहुत ज़्यादा महसूस करता था। उसे रिश्तों में शोर नहीं, सुकून चाहिए था। वह उन लोगों में से था जो सामने वाले को पूरा समय देते हैं—फोन हाथ में नहीं, दिल हाथ में रखकर बात करते हैं। पर बदले में उसे अक्सर अधूरा सा कुछ मिलता था।
उसकी ज़िंदगी में मीरा आई। मीरा तेज़, व्यस्त और हमेशा “थोड़ी देर बाद बात करते हैं” वाली लड़की थी। रवि हर बार इंतज़ार करता—मैसेज का, कॉल का, मिलने के एक वादे का। कभी मीटिंग, कभी दोस्त, कभी थकान। रवि खुद को समझाता, “व्यस्त है, मुझे समझना चाहिए।” लेकिन यह समझ धीरे-धीरे थकान बन गई।
एक दिन रवि बीमार था। तेज़ बुखार, शरीर टूट रहा था। उसने मीरा को मैसेज किया—“आज बहुत बुरा लग रहा है, क्या थोड़ी देर बात कर सकती हो?”
तीन घंटे बाद जवाब आया—“आज नहीं हो पाएगा, बहुत काम है।”
रवि ने फोन बंद कर दिया। उसे एहसास हुआ कि बात काम की नहीं, प्राथमिकता की है। जिसे सच में परवाह होती है, वह समय “निकालता” नहीं, “बनाता” है।
कुछ दिन बाद रवि ने मीरा से मिलने की ज़िद नहीं की। उसने बस चुप रहना शुरू कर दिया। मीरा को भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा। वही पुराना सिलसिला—कभी बात, कभी नहीं; कभी ध्यान, कभी गायब।
एक शाम रवि अपनी पुरानी दोस्त अनन्या से मिला। अनन्या ने बस इतना पूछा, “तू ठीक नहीं लग रहा।”
रवि की आँखें भर आईं। उसने सब बता दिया। अनन्या चुपचाप सुनती रही। फिर बोली,
“रवि, तुम किसी के जीवन में विकल्प बनने के लिए नहीं बने हो। तुम प्राथमिकता बनने के लायक हो। और जहाँ तुम्हें बार-बार यह एहसास दिलाया जाए कि तुम बोझ हो, वहाँ रुकना खुद से नाइंसाफी है।”
ये शब्द रवि के अंदर कहीं बहुत गहरे उतर गए।
उसने मीरा को आख़िरी बार मैसेज किया—
“मैं तुम्हारी ज़िंदगी में जगह मांगकर नहीं रह सकता। जहाँ मुझे बार-बार इंतज़ार करना पड़े, खुद को छोटा महसूस करना पड़े—वहाँ मैं नहीं रहूँगा। अगर कोई सच में चाहता है, तो समय अपने आप बन जाता है।”
मीरा ने कोई खास जवाब नहीं दिया। बस “ओके” लिखा।
और उसी “ओके” में रवि को अपनी सारी सच्चाई मिल गई।
कुछ हफ्तों बाद रवि ने खुद पर ध्यान देना शुरू किया। उसने वही किया जो उसे अच्छा लगता था—लिखना, घूमना, लोगों से खुलकर बात करना। अनन्या अक्सर हाल पूछ लेती। बिना जताए, बिना थकाए। जब भी रवि उदास होता, अनन्या का एक छोटा सा मैसेज आ जाता—“खाना खाया?”
रवि मुस्करा देता। उसे समझ आ गया कि प्यार शोर नहीं करता, वह साथ देता है।
अब रवि जानता था—
आप किसी के जीवन में “ऑप्शन” नहीं होते।
आप “प्रायोरिटी” बनने के योग्य होते हैं।
जहाँ आपको बोझ महसूस कराया जाए, वहाँ से चले जाना ही आत्मसम्मान है।
और सच यही है—
जो सच में चाहता है, उसके पास कभी “वक़्त नहीं” वाला बहाना नहीं होता।

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Rajeev Verma

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