लघु कथा -78

देवेश्वर जब आठ साल का था, तब उसकी दुनिया बहुत छोटी थी—स्कूल, गली में खेल, माँ की गोद और चाचा का घर। उसके पिता मज़दूरी के लिए बाहर रहते थे, इसलिए माँ अक्सर देवेश्वर को चाचा के घर छोड़ जाती। वही चाचा, जिसे सब भरोसेमंद समझते थे, देवेश्वर की मासूमियत को सबसे ज़्यादा तोड़ने वाला निकला।
देवेश्वर को ठीक-ठीक समझ नहीं आता था कि उसके साथ जो हो रहा है, वह गलत है। उसे बस डर लगता था, शर्म आती थी, और वह किसी को बता नहीं पाता था। चाचा धमकाता—“अगर बताया, तो तेरी माँ को मार दूँगा।”
देवेश्वर चुप हो गया। उसकी हँसी कहीं खो गई। वह खेल में मन नहीं लगाता, रात को डर कर उठ जाता, और खुद को गंदा समझने लगा।
माँ ने बदलाव देखा, पर कारण नहीं समझ पाई। स्कूल में देवेश्वर चिड़चिड़ा हो गया। बच्चे उससे दूर रहने लगे। शिक्षक ने डाँटा, तो उसने पत्थर फेंक दिया। किसी ने पहली बार उसे “बुरा लड़का” कहा—और वह उस नाम में खुद को पहचानने लगा।
समय बीता। चाचा शहर छोड़कर चला गया, पर जो ज़हर वह छोड़ गया, वह देवेश्वर के भीतर ही रह गया। वह बड़ा होने लगा, पर भीतर वही टूटा हुआ बच्चा था—गुस्से से भरा, भरोसे से खाली।
किशोरावस्था में उसने गलत संगत पकड़ ली। चोरी करना उसे आसान लगा—क्योंकि उसे दुनिया से कुछ छीनने में मज़ा आने लगा था।
“जब मेरी ज़िंदगी मुझसे छीनी गई, तो मैं भी छीनूँगा,” वह खुद से कहता।
धीरे-धीरे गुस्सा हिंसा में बदल गया। वह लड़ाइयों में चाकू निकाल लेता। उसे किसी की आँखों में डर देखकर अजीब-सी ताक़त मिलती—शायद वही ताक़त, जो कभी उससे छीनी गई थी।
एक रात उसने ऐसा अपराध कर डाला, जिसे माफ़ नहीं किया जा सकता। एक और ज़िंदगी उसकी वजह से टूट गई। जब पुलिस ने उसे पकड़ा, तो अख़बारों में सिर्फ़ इतना छपा—“निर्दयी अपराधी पकड़ा गया।”
किसी ने नहीं पूछा—वह निर्दयी कैसे बना।
जेल में एक सामाजिक कार्यकर्ता उससे मिलने आई। उसने सीधे सवाल नहीं किए। बस कहा,
“अगर चाहो, तो अपनी कहानी सुना सकते हो।”
पहली बार देवेश्वर ने रोना सीखा। उसने सब बता दिया—बचपन, डर, चुप्पी, गुस्सा।
और आख़िर में बोला,
“मैंने जो किया, वह गलत है। पर मैं भी कभी किसी का शिकार था।”
महिला ने कहा,
“तुम्हारा दर्द असली है, पर उसका इलाज किसी और को दर्द देकर नहीं हो सकता।”
उस रात देवेश्वर देर तक जागता रहा। उसे लगा जैसे वह अपने बचपन के सामने खड़ा है—वही छोटा देवेश्वर, जो मदद के लिए चुपचाप रो रहा था।
उसने उससे कहा,
“काश मैं तुझे बचा पाता… तो शायद मैं यह आदमी न बनता।”
देवेश्वर को सज़ा मिली—कठोर सज़ा। वह जानता था, यह ज़रूरी है।
पर वह यह भी जान गया था—
अगर टूटे बच्चों को समय पर सहारा मिल जाए,
अगर डर को शब्द मिल जाएँ,
तो शायद बहुत-से अपराध जन्म लेने से पहले ही मर जाएँ।
देवेश्वर अपराधी था—इसमें कोई शक नहीं।
पर वह इस बात की सबसे बड़ी मिसाल भी था कि
टूटा हुआ बचपन, अगर न संभाला जाए,
तो वही टूटन किसी और की ज़िंदगी तोड़ देती है।

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Rajeev Verma

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