छोटे से कस्बे में अर्जुन अपने पिता हरदेव के साथ रहता था। माँ बहुत पहले गुजर चुकी थी। हरदेव का स्वभाव कठोर था—कम बोलता, ज़्यादा डाँटता। अर्जुन ज़रा-सी गलती करता, तो बेल्ट चल जाती।
“मर्द बनना है तो दर्द सहना सीख,” हरदेव कहता।
अर्जुन चुपचाप सहता रहा। स्कूल से थका-हारा लौटता, पर घर उसे आराम नहीं, डर देता था। कभी कम नंबर आए, तो मार। कभी देर हो गई, तो मार। उसे याद नहीं कि पिता ने कभी प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा हो।
रात को वह तकिए में मुँह छुपाकर रोता और मन ही मन कहता,
“एक दिन मैं बड़ा बनूँगा, तब तुम्हें दिखाऊँगा।”
समय बीतता गया। अर्जुन जवान हो गया। उसने पढ़ाई पूरी की और शहर जाकर नौकरी पा ली। पहली तनख्वाह हाथ में आई, तो उसे खुशी कम और बदले की आग ज़्यादा लगी। उसने सोचा—
“अब मेरी बारी है।”
वह घर लौटा। हरदेव बूढ़ा हो गया था। कमर झुक गई थी, आँखों में वही कठोरता थी, पर शरीर में पहले-सी ताक़त नहीं रही थी।
अर्जुन ने ठंडे स्वर में कहा, “अब मैं कमाता हूँ। अब आप मेरे भरोसे हो।”
हरदेव चुप रहा।
धीरे-धीरे अर्जुन वही करने लगा, जो उसने बचपन में झेला था।
अगर हरदेव ज़रा-सा काम ठीक से न कर पाते, तो अर्जुन चिल्लाता—
“कुछ आता ही नहीं आपको!”
खाना देर से मिला, तो थाली पटक देता।
दवा भूल जाते, तो ताना मारता—
“जब मुझे मारते थे, तब याद नहीं आता था कि मैं बच्चा हूँ?”
हरदेव सब सहता रहा। कभी-कभी उसकी आँखों में नमी आ जाती, पर वह कुछ नहीं कहता।
एक रात हरदेव को तेज़ बुखार आया। वह काँप रहा था। अर्जुन ने देखा, पर बोला,
“ड्रामा मत करो, सुबह ले चलूँगा डॉक्टर के पास।”
रात में हरदेव बार-बार उठकर पानी माँगता रहा, पर अर्जुन सोता रहा—या यूँ कहें, सोने का नाटक करता रहा।
सुबह हरदेव की हालत बिगड़ गई। पड़ोसी दौड़े आए। डॉक्टर बुलाया गया, पर देर हो चुकी थी। हरदेव की साँस टूट गई।
घर में सन्नाटा छा गया। अर्जुन पहली बार घबरा गया। वह पिता के पास बैठा और बोला,
“अब क्यों चुप हो? अब तो तुम्हें सब समझ आ गया होगा कि दर्द क्या होता है।”
पर जवाब नहीं आया।
पड़ोस की बूढ़ी अम्मा बोली,
“बेटा, तेरे पिता गलत थे, पर तू भी वही बन गया।”
ये शब्द अर्जुन के दिल में तीर की तरह लगे। उसे अचानक बचपन का वह अर्जुन याद आया—डरा हुआ, रोता हुआ, मार खाता हुआ।
उसने सोचा,
“जिस आदमी से मैं नफरत करता था, मैं खुद वही बन गया।”
उस रात वह सो नहीं पाया। उसे लगा जैसे उसका बचपन का रूप उससे पूछ रहा हो—
“तू बदला लेना चाहता था या ज़ख्म बढ़ाना?”
उसे समझ आया कि घृणा आग की तरह होती है—जो उसे पकड़ता है, पहले वही जलता है।
उसने पिता को सज़ा नहीं दी,
उसने बस अपने भीतर उसी ज़ुल्म को ज़िंदा कर लिया।
और अर्जुन ने जाना—
घृणा का चक्र तोड़ना सबसे मुश्किल होता है,
क्योंकि आदमी अक्सर उसी का रूप बन जाता है,
जिससे वह सबसे ज़्यादा नफरत करता है।