लघु कथा – 76

गाँव के एक शांत कोने में रहते थे—हरिराम और शारदा। उम्र ढल चुकी थी, शरीर कमजोर हो गया था, पर मन अब भी मजबूत था। उनका एक ही बेटा था—विनय, जो शहर में नौकरी करता था। शादी के बाद वह अपनी पत्नी रिया के साथ अलग रहने लगा। शुरू-शुरू में सब ठीक था, पर धीरे-धीरे दूरी बढ़ती गई।
रिया को लगता था कि सास-ससुर पुराने ख्यालों के हैं, हर बात में टोकते हैं। विनय भी दुविधा में रहता—माँ-बाप और पत्नी के बीच। कई बार बात बिगड़ जाती। फोन पर कटु शब्द कहे जाते। कभी-कभी विनय गुस्से में कह देता,
“आप लोग हमें समझते ही नहीं, बस अपनी बातें थोपते हो।”
हरिराम चुप रहते। शारदा का दिल दुखता, पर वह भी कुछ नहीं कहती। वह कहती, “बेटा है, आज नहीं समझेगा, कल समझेगा।”
एक दिन रिया ने सीधा कह दिया,
“आप दोनों हमें परेशान करते हो, इसलिए हम कम आते हैं।”
शारदा की आँखों में आँसू आ गए, पर उसने सिर झुका लिया।
हरिराम ने बस इतना कहा, “अगर हमसे कोई भूल होती हो, तो हमें बताना।”
गाँव के लोग कहते, “इतनी बात सुनकर भी चुप कैसे रहते हो?”
हरिराम मुस्कुराते, “निन्दा किए जाने पर जो प्रतिनिन्दा नहीं करता, उसे दुहरी विजय मिलती है।”
समय बीतता गया। एक दिन विनय की नौकरी चली गई। शहर का किराया, खर्च—सब भारी पड़ने लगा। विनय और रिया परेशान हो गए। किसी ने मदद नहीं की। तब उन्हें याद आया—गाँव में माँ-बाप हैं।
वे अचानक गाँव पहुँचे। शारदा ने दरवाज़ा खोला। कुछ नहीं पूछा, बस अंदर ले आई। हरिराम ने विनय का बैग उठाया, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
रात को विनय रो पड़ा। बोला,
“मैंने आपको कितना दुख दिया, फिर भी आपने कुछ नहीं कहा।”
हरिराम ने प्यार से कहा,
“बेटा, जवाब देकर झगड़ा बढ़ता है। चुप रहकर हम दिल जीतना चाहते थे।”
रिया भी रोने लगी। उसने कहा,
“मुझे लगा आप हमें दबाना चाहते हो, पर आपने तो हमें कभी छोड़ा ही नहीं।”
कुछ महीनों तक विनय गाँव में रहा। उसने देखा—माँ-बाप कैसे बिना शिकायत के सबके लिए करते हैं। धीरे-धीरे उसका मन बदलने लगा।
एक दिन उसने सबके सामने कहा,
“आप दोनों ने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया, इसलिए आज मुझे अपनी गलती साफ दिख रही है।
आप जीत गए—दो बार।
एक बार चुप रहकर,
और दूसरी बार मेरा दिल जीतकर।”
रिया ने शारदा के पैर छुए। बोली,
“माँ, आपने जो सहा, उसका जवाब मैंने कभी नहीं दिया।”
शारदा ने उसे गले लगा लिया। बोली,
“बेटी, घर जवाब से नहीं, समझ से चलता है।”
और उस दिन हरिराम ने मन ही मन कहा—
“निन्दा किए जाने पर जो प्रतिनिन्दा नहीं करता,
वही सच में दुहरी विजय पाता है।”

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Rajeev Verma

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