लघु कथा -75

पुराने शहर की तंग गलियों में अलीमुद्दीन का छोटा-सा घर था। दीवारें पुरानी थीं, छत से कभी-कभी पानी टपक जाता, पर उस घर में सुकून था। अलीमुद्दीन दर्ज़ी था—दिन भर कपड़े सिलता, शाम को मस्जिद में नमाज़ पढ़ता और रात को बच्चों के साथ बैठकर बातें करता।
उसकी पत्नी ज़रीना बहुत सादा दिल की थी। वह कहती, “थोड़ा कम हो तो भी चले, पर दिल हल्का रहे।”
बड़ा बेटा इमरान पढ़ाई में तेज़ था। उसके सपने बड़े थे—वह अमीर बनना चाहता था, बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, बड़ा नाम।
एक दिन इमरान को एक आदमी मिला, जो जल्दी पैसा कमाने की बातें करता था। बोला, “मेरे साथ काम करोगे, तो महीने में इतना कमाओगे जितना तुम्हारे अब्बा साल में नहीं कमाते।”
इमरान की आँखों में चमक आ गई। उसने घर आकर बताया।
अलीमुद्दीन ने शांत होकर कहा, “बेटा, जल्दी का पैसा अक्सर देर का दुख देता है।”
इमरान बोला, “अब्बा, आप हमेशा कम में खुश रहते हो, इसलिए कभी आगे नहीं बढ़ पाए।”
ये शब्द अलीमुद्दीन के दिल में चुभ गए, पर उसने कुछ नहीं कहा।
इमरान उस आदमी के साथ काम करने लगा। शुरू में खूब पैसा आया। वह नए कपड़े लाया, दोस्तों को खिलाया। उसे लगने लगा कि अब्बा गलत थे।
पर कुछ महीनों बाद वह आदमी पकड़ा गया। गैर-कानूनी धंधे में उसका नाम भी आ गया। पुलिस आई, पूछताछ हुई। इमरान की आँखों से नींद उड़ गई। घर में डर छा गया।
ज़रीना रोती रही, “हमने क्या गुनाह किया?”
अलीमुद्दीन ने बेटे का हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, लालच आदमी को अंधा कर देता है।”
इमरान टूट गया। उसने कहा, “अब्बा, मुझे माफ़ कर दो। मैंने लालसा में आकर सब गँवा दिया—इज़्ज़त, चैन, आपका भरोसा।”
अलीमुद्दीन ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले, पर आवाज़ में सुकून था, “गिरकर उठना ही असली जीत है।”
कुछ दिनों बाद मामला साफ़ हो गया। इमरान को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। वह फिर पढ़ाई में लग गया, और साथ में अब्बा की दुकान में मदद करने लगा।
एक शाम मस्जिद से लौटते हुए इमरान ने कहा,
“अब्बा, आपने कभी अमीर बनने का सपना नहीं देखा?”
अलीमुद्दीन मुस्कुराया, “देखा था, बेटा। पर फिर समझ आया—इन्सान यदि लालसा और महत्त्वाकांक्षा को त्याग दे, तो वह बादशाह से कहीं ऊँचा दर्जा हासिल कर सकता है।”
इमरान ने पूछा, “कैसे?”
अलीमुद्दीन बोला, “जिसके पास कम होकर भी संतोष हो, वही असली बादशाह है।
लालच ही आदमी की ऊँचाई में बाधक बनता है।”
उस रात इमरान देर तक जागता रहा। उसने देखा—उसके अब्बा के पास बड़ी दौलत नहीं, पर इज़्ज़त थी। डर नहीं, चैन था। झूठ नहीं, सच्चाई थी।
धीरे-धीरे इमरान बदल गया। अब वह बड़े सपनों से नहीं, अच्छे इंसान बनने से खुश होता था। जब भी लालच मन में उठता, वह अब्बा की आँखों में देखता—और शांत हो जाता।
और उस छोटे-से घर में, बिना ताज के, बिना तख़्त के—
एक सच्चा बादशाह रहता था: संतोष।

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Rajeev Verma

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