लघु कथा – 74

रामदयाल का परिवार पहाड़ों के छोटे-से गाँव से निकलकर बड़े महानगर पहुँचा था। गाँव में कच्चे रास्ते, खुले आँगन, नीम का पेड़ और सुबह की ठंडी हवा थी। शहर में ऊँची इमारतें, तेज़ गाड़ियाँ, शोर और भीड़। एक ही जगह—पर सबकी नज़र अलग-अलग।
रामदयाल को शहर डरावना लगता। उसे लगता, यहाँ हर आदमी दौड़ रहा है, जैसे किसी ने पीछा कर रखा हो। वह जब सड़क पार करता, तो घबराता—“यहाँ आदमी नहीं, मशीनें चलती हैं।” उसे अपना गाँव याद आता, जहाँ समय धीरे चलता था।
उसकी पत्नी कमला को शहर अवसरों का घर लगता। वह कहती, “यहाँ बच्चों के लिए पढ़ाई है, आगे बढ़ने का रास्ता है।” उसे शोर में भी उम्मीद की आवाज़ सुनाई देती थी।
बेटा राहुल कॉलेज जाने लगा। उसके लिए शहर सपनों की जगह थी—मॉल, मेट्रो, दोस्त, नए कपड़े। उसे लगता, “गाँव में रह जाता तो कुछ नहीं बन पाता।”
छोटी बेटी गुनगुन को शहर एक खेल का मैदान लगता—लिफ्ट में चढ़ना, पार्क में झूले, रोशनी से भरी सड़कें।
पहले ही महीने रामदयाल को काम मिला—एक निर्माण स्थल पर चौकीदारी। वह रात भर जागता, और सोचता—“मेरे लिए शहर मतलब थकान।”
कमला पास की सोसाइटी में काम करने लगी। वह लौटकर बताती—“आज पहली बार मैंने वॉशिंग मशीन देखी।” उसकी आँखों में चमक होती।
राहुल पार्ट-टाइम नौकरी करने लगा। वह पैसे देखकर खुश होता—“अब मैं खुद कमा रहा हूँ।”
गुनगुन स्कूल में नए दोस्त बनाती और रोज़ नई कहानी लाती।
एक रविवार सब साथ छत पर बैठे। नीचे शहर चमक रहा था।
रामदयाल बोला, “मुझे तो यह जंगल लगता है—कंक्रीट का जंगल।”
कमला बोली, “मुझे यह रास्ता लगता है—आगे बढ़ने का।”
राहुल बोला, “मुझे यह मौका लगता है—कुछ बड़ा करने का।”
गुनगुन बोली, “मुझे यह मेले जैसा लगता है।”
रामदयाल ने पूछा, “एक ही शहर, पर हम चारों को चार तरह क्यों दिखता है?”
कमला ने हँसकर कहा, “क्योंकि अपने दृष्टिकोण के अनुरूप सारा वातावरण दीख पड़ता है।”
एक दिन गाँव से खबर आई—पुराना घर टूटने लगा है। रामदयाल उदास हो गया। वह बोला, “लगता है, मेरा संसार वहीं रह गया।”
राहुल ने कहा, “पापा, संसार जगह नहीं होता, नज़र होता है।”
कमला ने जोड़ा, “हर व्यक्ति का अपना संसार अलग से रचा हुआ है।”
कुछ दिन बाद वे गाँव गए। रामदयाल खुश हो गया—पेड़, हवा, शांति।
राहुल को वही गाँव छोटा और धीमा लगा।
कमला को दोनों में अच्छा दिखा—गाँव की शांति और शहर का अवसर।
गुनगुन ने कहा, “यहाँ भी खेल है, वहाँ भी।”
लौटते समय रामदयाल ने सोचा—“मैं अपने डर का शहर बनाकर घूमता रहा।” उसने ठान लिया—अब वह शहर को दुश्मन नहीं, साथी मानेगा।
धीरे-धीरे उसे भी शहर में कुछ अच्छा दिखने लगा—सुबह की चाय की दुकान, परिचित चेहरे, काम की इज़्ज़त। उसे समझ आ गया—
अपने दृष्टिकोण के अनुरूप सारा वातावरण दीख पड़ता है।
हर व्यक्ति का अपना संसार अलग से रचा हुआ है,
और वह उसी में विचरण करता रहता है।

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Rajeev Verma

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