लघु कथा – 73

राधा, नेहा और मीरा—तीनों एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। बचपन से साथ थीं, पर स्वभाव बिल्कुल अलग। राधा हमेशा बीते कल में जीती थी। उसे लगता था कि उसने बारहवीं में कम नंबर लाकर अपनी ज़िंदगी खराब कर ली। नेहा हर समय भविष्य के सपने बुनती रहती—कौन-सी नौकरी मिलेगी, कितना पैसा होगा, कैसी ज़िंदगी होगी। मीरा बस आज में जीती थी—न लापरवाही से, बल्कि समझदारी से।
एक दिन कॉलेज में नोटिस लगा—एक महीने बाद प्रतियोगी परीक्षा है, जिसमें पास होने पर स्कॉलरशिप मिलेगी।
राधा बोली, “अब क्या फायदा, मेरी नींव ही कमजोर है।”
नेहा बोली, “अभी नहीं पढ़ूँगी, बाद में देखेंगे। अभी तो सोचने दो कि पास होकर क्या करूँगी।”
मीरा ने कहा, “आज से पढ़ेंगे, आज का काम आज।”
रोज़ मीरा लाइब्रेरी जाती, नोट्स बनाती, सवाल हल करती। राधा कभी-कभी आती, पर अक्सर पुरानी असफलताओं को याद करके मन छोड़ देती। नेहा बस भविष्य के सपनों में खोई रहती।
एक दिन राधा उदास होकर बोली, “काश मैं पहले मेहनत करती।”
मीरा ने कहा, “बीते कल को सुधार नहीं सकते।”
नेहा बोली, “पर आने वाला कल सब ठीक कर देगा।”
मीरा मुस्कुराई, “आने वाला कल कभी भी नहीं आ सकता। वह हमेशा ‘कल’ ही रहता है।”
परीक्षा नज़दीक आई। राधा घबराने लगी। नेहा अब भी टालती रही। मीरा रोज़ की तरह पढ़ती रही—थोड़ा-थोड़ा, पर लगातार।
परीक्षा के बाद रिज़ल्ट आया। मीरा पास हो गई—अच्छे अंकों से। राधा थोड़े से नंबरों से रह गई। नेहा फेल हो गई।
राधा रोने लगी, “मैं तो बस अपने पुराने नुकसान में ही उलझी रही।”
नेहा बोली, “मैं तो बस भविष्य के सपनों में जीती रही।”
मीरा ने उनका हाथ पकड़ा और कहा,
“मात्र आज ही हमारा है। उसका सर्वोत्तम सदुपयोग करो, क्योंकि वही हमारी एकमात्र निश्चित सम्पत्ति है।”
राधा ने ठान लिया—अब पछतावे में नहीं जिएगी। नेहा ने ठान लिया—अब सिर्फ़ सपने नहीं देखेगी, काम भी करेगी। तीनों ने अगली परीक्षा के लिए साथ पढ़ना शुरू किया—हर दिन थोड़ा, पर पक्का।
राधा अब जब भी निराश होती, खुद से कहती—“बीते कल को नहीं बदल सकती, पर आज को बेहतर बना सकती हूँ।”
नेहा जब आलस करती, तो खुद से कहती—“कल का भरोसा मत कर, आज कर।”
और मीरा—वह तो पहले से जानती थी कि ज़िंदगी का असली खज़ाना “आज” है।
अगली बार तीनों पास हुईं। इस बार खुशी सिर्फ़ नंबरों की नहीं थी, बल्कि इस बात की थी कि उन्होंने ज़िंदगी का सही नियम समझ लिया था—
बीता कल हाथ से गया, आने वाला कल भरोसेमंद नहीं,
मात्र आज ही हमारा है—और वही हमारी सबसे कीमती सम्पत्ति है।लघु कथा

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Rajeev Verma

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