शर्मा और वर्मा—दो परिवार, एक ही गली में आमने-सामने रहते थे। सालों से उनके बीच ऐसा भरोसा था कि लोग कहते, “ये दो घर नहीं, एक ही आँगन के दो कोने हैं।” बच्चों की पढ़ाई से लेकर शादी-ब्याह तक, दोनों परिवार एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते।
शर्मा जी स्वभाव से बहुत समझदार थे, पर एक आदत थी—हर बात में राय देना। उन्हें लगता था कि उनका अनुभव ही सबसे बड़ा खज़ाना है, और उसे सबको मिलना चाहिए। वर्मा जी शांत स्वभाव के थे, कम बोलते थे, पर गहराई से सोचते थे।
एक दिन वर्मा परिवार ने तय किया कि उनका बड़ा बेटा शहर जाकर नौकरी करेगा। शर्मा जी को यह ठीक नहीं लगा। उन्होंने बिना पूछे ही समझाना शुरू कर दिया—
“अरे, शहर में लड़का बिगड़ जाएगा। यहीं दुकान खुलवा दो, यही सही है।”
वर्मा जी चुप रहे, पर भीतर उन्हें अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि दोस्ती तोड़ना नहीं चाहते थे।
धीरे-धीरे शर्मा जी हर बात में टोकने लगे—बच्चों की पढ़ाई, बहू का पहनावा, घर का खर्च। वर्मा परिवार सुनता रहा, पर मन में कसक बढ़ती गई। उन्हें लगने लगा कि दोस्ती में भी इज़्ज़त कम हो रही है।
एक दिन वर्मा जी की पत्नी बीमार पड़ गईं। शर्मा जी दौड़कर आए और बोले,
“तुम लोग गलत इलाज करा रहे हो, मेरे जानने वाले डॉक्टर के पास ले चलो।”
वर्मा जी ने पहली बार धीरे से कहा, “धन्यवाद, पर हमने पहले ही डॉक्टर चुन लिया है।”
शर्मा जी को यह बात चुभ गई। उन्हें लगा कि उनकी बात को ठुकराया जा रहा है। उन्होंने मन ही मन सोचा—“मैं तो अमृत दे रहा हूँ, ये लोग समझते ही नहीं।”
कुछ दिनों बाद वर्मा जी खुद शर्मा जी के पास आए। बोले,
“भाई साहब, एक बात दिल से कहूँ?”
शर्मा जी बोले, “कहो।”
वर्मा जी ने शांति से कहा,
“ज़बरदस्ती हर किसी का मुँह खोलकर अमृत भी डालना चाहोगे, तो लोग उसे विष समझकर थूक ही नहीं देंगे, बल्कि आपको पागल भी समझेंगे। अपनी राय तभी दो, जब कोई उसको माँगे।”
शर्मा जी चुप हो गए। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उनका ज्ञान, उनकी चिंता—सब सही हो सकते हैं, पर तरीका गलत था। उन्होंने सिर झुकाकर कहा,
“शायद मैं दोस्ती निभाते-निभाते सीमा भूल गया।”
उस दिन के बाद शर्मा जी बदल गए। अब वे तब तक कुछ नहीं कहते, जब तक वर्मा परिवार खुद न पूछे। और जब पूछते, तो वे पूरे मन से सुनते, बिना ज़ोर डाले सलाह देते।
कुछ महीनों बाद वर्मा जी का बेटा शहर से लौटा—अच्छी नौकरी लेकर। उसने आकर शर्मा जी के पैर छुए और बोला,
“चाचा, कई बार आपकी बातें याद आईं। अच्छा लगा कि आपने मुझे अपनी तरह बनने को मजबूर नहीं किया।”
शर्मा जी की आँखें भर आईं। उन्होंने महसूस किया कि भरोसा ज़बरदस्ती से नहीं, सम्मान से बनता है।
अब दोनों परिवारों के बीच रिश्ता पहले से भी गहरा हो गया। लोग कहते,
“शर्मा और वर्मा अब सच में समझ गए हैं—
सलाह अमृत है, पर तभी, जब उसे माँगा जाए।”