लघु कथा – 70

सावंत और नीलांबरी एक साधारण-से कस्बे में रहते थे। उनका घर बड़ा नहीं था, पर उसमें हमेशा एक अजीब-सी शांति रहती थी। मोहल्ले के लोग अक्सर कहते, “इनके घर को देखो, जैसे मंदिर का माहौल हो—सब एक-दूसरे के लिए कितनी श्रद्धा, कितना प्रेम रखते हैं।”
सावंत एक छोटी दुकान चलाता था और नीलांबरी घर संभालती थी। उनके साथ बूढ़े माता-पिता और दो बच्चे रहते थे। इतने लोगों का एक ही छत के नीचे रहना आसान नहीं था। कभी बच्चों की शरारत, कभी सास-बहू की नोकझोंक, कभी पैसे की तंगी—सब कुछ था। पर इन सबके बीच जो चीज़ नहीं थी, वह था ज़हर—कटुता का ज़हर।
नीलांबरी हर सुबह सबसे पहले सबको नमस्ते करती। सास के पैर छूती, ससुर को पानी देती, बच्चों को प्यार से जगाती। सावंत दुकान जाने से पहले सबका हाल पूछता। वह कहता, “घर अगर ठीक है, तो बाहर की हर लड़ाई आसान लगती है।”
एक दिन सावंत की दुकान में घाटा हो गया। वह चुपचाप घर लौटा। नीलांबरी ने उसके चेहरे से ही सब समझ लिया। उसने बिना सवाल किए खाना परोसा और बोली, “आज थोड़ा कम खा लो, पर चिंता मत करो—हम मिलकर संभाल लेंगे।”
सावंत की आँखें भर आईं। उसने सोचा—यही तो मंदिर है, जहाँ कोई मूर्ति नहीं, पर विश्वास है।
कुछ दिन बाद बच्चों में झगड़ा हो गया। बड़ा बेटा बोला, “माँ, यह मेरा खिलौना तोड़ दिया!”
छोटी बेटी रोने लगी। नीलांबरी ने दोनों को पास बिठाया और बोली, “मंदिर में कोई लड़ता है क्या?”
बच्चे चुप हो गए।
सावंत ने कहा, “हमारा घर मंदिर है—यहाँ हम एक-दूसरे को नहीं तोड़ते, जोड़ते हैं।”
एक बार सास नाराज़ हो गईं। उन्हें लगा कि नीलांबरी उनकी बात नहीं मान रही। पूरे दिन घर में खामोशी रही। शाम को नीलांबरी उनके पास गई, हाथ जोड़कर बोली, “अगर मुझसे भूल हुई हो, तो माफ़ कर दीजिए। आपका दिल दुखा, तो घर का मंदिर हिल गया।”
सास की आँखें भर आईं। उन्होंने नीलांबरी को गले लगा लिया।
मोहल्ले में लोग इनके घर का उदाहरण देने लगे। जब कहीं झगड़ा होता, तो कहते, “सावंत-नीलांबरी से सीखो। उनके घर में देखो—कैसी शांति है।”
एक दिन एक पड़ोसी बोला, “तुम लोग इतने शांत कैसे रहते हो?”
सावंत मुस्कुराया, “मंदिर में शांति अपने आप नहीं रहती, उसे रोज़ सँभालना पड़ता है।”
नीलांबरी बोली, “अपने घर के मंदिर में सबको खुश रखना आसान नहीं, पर यही सबसे बड़ा धर्म है।”
रात को सब साथ बैठकर खाना खाते। हँसी-ठिठोली होती, कभी छोटी-सी नोकझोंक भी, पर कोई दिल में बात नहीं रखता। सब जानते थे—मूर्ति के बीच रहना आसान है, पर इंसानों के बीच मंदिर बनाना कठिन।
और सावंत-नीलांबरी ने यह कठिन काम प्रेम, श्रद्धा और समझदारी से कर दिखाया—इसलिए उनका घर सच में मंदिर बन गया।

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Rajeev Verma

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