बाबू को लोग अजीब कहते थे। वह चुप रहता, कम बोलता और अक्सर खिड़की से बाहर देखते हुए घंटों बैठा रहता। मोहल्ले के बच्चों को लगता था कि बाबू बहुत बूढ़ा है, जबकि उसकी उम्र बस पचास के आसपास थी। सच तो यह था कि बाबू की उम्र उसके चेहरे पर नहीं, उसके अकेलेपन में दिखती थी।
कभी बाबू की ज़िंदगी बहुत भरी हुई थी। उसकी पत्नी सरिता हँसते-हँसते पूरा घर भर देती थी। सुबह चाय बनाते हुए वह कुछ न कुछ गुनगुनाती रहती और बाबू अखबार के पीछे से मुस्कराता हुआ उसकी बातें सुनता। शाम को दोनों छत पर बैठकर दिन भर की छोटी-बड़ी बातें करते। तब समय कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चलता था। एक घंटा एक पल जैसा लगता था।
लेकिन सरिता के जाने के बाद सब बदल गया। घर वही था, कमरे वही थे, लेकिन उनमें जान नहीं थी। बाबू के लिए अब दिन बहुत लंबे हो गए थे। सुबह उठता तो घड़ी की टिक-टिक उसे चुभने लगती। दोपहर काटने को दौड़ती और रातें तो जैसे खत्म ही नहीं होतीं। वह अक्सर सोचता—जब सरिता थी, तब तो समय उड़ जाता था, अब हर मिनट बोझ क्यों लगता है?
बाबू ने अकेलेपन से लड़ने की बहुत कोशिश की। कभी रेडियो चला देता, कभी टीवी, कभी अखबार को बार-बार पढ़ता। लेकिन इन सब में कोई अपनापन नहीं था। ये चीज़ें आवाज़ देती थीं, पर साथ नहीं देती थीं। बाबू को एहसास होने लगा कि अकेलापन सिर्फ दिल को नहीं, उम्र को भी बढ़ा देता है। वह खुद को पहले से कहीं ज़्यादा थका हुआ महसूस करने लगा था।
एक दिन मोहल्ले में नया परिवार आया। उनके साथ एक छोटी सी लड़की भी थी—पायल। वह रोज़ शाम को बाबू के घर के सामने खेलती। एक दिन उसकी गेंद बाबू के आँगन में चली गई। पायल डरते-डरते अंदर आई और बोली, “बाबू अंकल, मेरी गेंद दे दोगे?”
बाबू ने पहली बार किसी को अपने घर में मुस्कराकर बुलाया। उसने गेंद दी और धीरे से पूछा, “अकेले क्यों खेल रही हो?”
पायल बोली, “मम्मी काम में हैं, पापा ऑफिस में। पर मुझे अकेले खेलना अच्छा नहीं लगता।”
उस दिन के बाद पायल रोज़ बाबू के पास आने लगी। कभी उसे कहानी सुनाने को कहती, कभी अपने स्कूल की बातें बताती। बाबू भी उसके साथ बातें करने लगा। उसे महसूस हुआ कि जब पायल आती है, तब समय फिर से छोटा हो जाता है। एक घंटा पलक झपकते बीत जाता, जैसे पुराने दिनों में सरिता के साथ बीतता था।
अब बाबू समझ गया था कि उम्र सिर्फ सालों से नहीं बढ़ती, अकेलेपन से भी बढ़ती है। और प्रेम सिर्फ पति-पत्नी के बीच नहीं होता, वह किसी भी रिश्ते में हो सकता है जहाँ अपनापन हो। पायल की हँसी में बाबू को फिर से ज़िंदगी की हल्कापन मिलने लगा था।
आज भी बाबू अकेला रहता है, लेकिन अब वह खुद को अकेला नहीं मानता। वह जान गया है कि जहाँ प्रेम होता है, वहाँ समय सिमट जाता है, और जहाँ खालीपन होता है, वहाँ एक पल भी उम्र बढ़ा देता है।