सरकारी स्कूल के सबसे पुराने अध्यापक थे—ओमप्रकाश। सफ़ेद बाल, मोटा चश्मा और आवाज़ में अब भी वही सख़्ती और अपनापन। बच्चे उन्हें “मास्टर जी” कहते थे, पर उनके लिए वे सिर्फ़ पढ़ाने वाले नहीं, रास्ता दिखाने वाले थे।
एक दिन ओमप्रकाश कक्षा में एक मोटी-सी पुरानी किताब लेकर आए। किताब के पहले पन्ने फटे थे, बीच-बीच में स्याही फैल गई थी, और आख़िरी पन्ने बहुत साफ़-सुथरे और सुंदर थे। उन्होंने किताब मेज़ पर रखी और बोले,
“बच्चो, इस किताब को देखो। आख़िरी पन्ने बहुत अच्छे हैं, है न?”
बच्चों ने हाँ में सिर हिलाया।
ओमप्रकाश बोले,
“हो सकता है तुम अपनी ज़िन्दगी की किताब के आख़िरी पन्ने बहुत अच्छे बनाओ। मगर पढ़ने वाले यही सोचेंगे कि इस व्यक्ति ने कितनी अन्तः-शक्ति, कितना वक़्त व्यर्थ गंवाया है। यह किताब कितनी आकर्षक हो जाती, यदि इसने अपने जीवन में बहुत पहले यह रुख़ अपनाया होता!”
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
तभी रामू बोला, “मास्टर जी, कोई अगर आख़िर में सुधर जाए, तो क्या वह अच्छा नहीं है?”
ओमप्रकाश मुस्कुराए, “अच्छा तो है, बेटा। पर सोचो, अगर वह पहले ही सुधर जाता, तो वह कितना ज़्यादा अच्छा कर सकता था—अपने लिए भी, दूसरों के लिए भी।”
उन्होंने अपनी कहानी सुनानी शुरू की।
“मैं भी तुम्हारी तरह एक समय बहुत आलसी था। पढ़ाई टालता रहता था। सोचता था—कल कर लूँगा, परसों कर लूँगा। जब होश आया, तो बहुत-सा समय हाथ से निकल चुका था। तब मैंने खुद से कहा—अब जो बचा है, उसे बेकार नहीं जाने दूँगा। मैंने मेहनत की और अध्यापक बना। पर आज भी सोचता हूँ—अगर यह मेहनत मैंने पहले शुरू की होती, तो शायद मैं और ऊँचा पहुँच सकता था।”
बच्चों ने पहली बार अपने मास्टर जी की आँखों में हल्की-सी नमी देखी।
अगले दिन उन्होंने बच्चों को एक काम दिया—“अपने जीवन की किताब का पहला पन्ना लिखो—तुम क्या बनना चाहते हो, और उसके लिए आज से क्या करोगे।”
राधा ने लिखा—डॉक्टर बनूँगी, रोज़ दो घंटे पढ़ूँगी।
अमन ने लिखा—इंजीनियर बनूँगा, गणित पर ज़्यादा ध्यान दूँगा।
छोटे मोनू ने लिखा—अच्छा इंसान बनूँगा, झूठ नहीं बोलूँगा।
ओमप्रकाश हर कापी पढ़ते गए और मन ही मन खुश होते गए। उन्हें लगा, शायद उनके शब्दों ने किसी का समय बचा लिया है।
कुछ साल बाद, वही बच्चे बड़े होकर लौटे। कोई डॉक्टर बना, कोई अफ़सर, कोई शिक्षक। वे ओमप्रकाश से मिलने आए और बोले,
“मास्टर जी, उस दिन आपने किताब की जो बात कही थी, उसने हमें आज से ही बदल दिया।”
ओमप्रकाश ने मुस्कुरा कर कहा,
“बेटा, ज़िन्दगी की किताब सुंदर तब होती है, जब हर पन्ना ईमानदारी, मेहनत और सही वक़्त पर लिए गए फैसलों से भरा हो—सिर्फ़ आख़िरी पन्ने नहीं।”
और बच्चों ने समझ लिया—अच्छा बनना देर से भी ठीक है,
पर जल्दी बनना कहीं ज़्यादा फलदायक होता है।