गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना-सा घर था, जिसमें रहती थी बूढ़ी सुषीला। सफ़ेद बाल, झुकी कमर और चेहरे पर ऐसी शांति, जैसे किसी लंबे सफ़र के बाद मिली हो। लोग उसे देखकर कहते, “बेचारी, कितनी अकेली है।” पर सुषीला खुद को कभी अकेली नहीं मानती थी। वह कहती, “अकेलापन तब होता है, जब आदमी किसी के काम न आए।”
उसका पति बरसों पहले गुजर गया था। बच्चे शहर जाकर बस गए थे। शुरू-शुरू में सुषीला को भी लगा था कि शायद अब जीवन में सुख नहीं बचेगा। पर एक दिन उसने खुद से पूछा—“क्या सच में जीवन की मंज़िल सुख है?” उसी दिन उसने तय किया कि वह सिर्फ़ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जिएगी।
हर सुबह वह सबसे पहले मंदिर जाती, फिर गाँव की गलियों में निकल पड़ती। किसी के घर में बच्चा बीमार होता, तो सुषीला अपने पुराने नुस्खे लेकर पहुँच जाती। किसी की बहू उदास होती, तो उसे पास बैठाकर कहती, “बेटी, दुःख भी बादल की तरह होता है, रुकता नहीं।” किसी के घर में झगड़ा होता, तो वह दोनों को बैठाकर सच्चाई और भलाई की बात समझाती।
लोग धीरे-धीरे समझने लगे कि सुषीला सिर्फ़ बूढ़ी औरत नहीं है, वह चलती-फिरती सीख है।
एक दिन गाँव में एक नौजवान आया—नाम था रोहन। वह बहुत परेशान था। उसने कहा, “दादी, मैं सुख ढूँढ रहा हूँ, पर मिल नहीं रहा।”
सुषीला मुस्कुराई, “बेटा, इन्सान की मंज़िल सुख नहीं है।”
रोहन चौंका, “तो फिर क्या है?”
सुषीला बोली, “इन्सान की मंज़िल है एक फलदायक जीवन, एक परोपकारी जीवन, एक सफल जीवन, जिसमें सच्चाई-भलाई की स्पष्ट छाप हो।”
उसने रोहन को अपने साथ चलने को कहा। पहले वे एक बूढ़े किसान के पास गए, जिसकी फसल खराब हो गई थी। सुषीला ने अपने जमा किए पैसे उसे दे दिए। रोहन ने पूछा, “आपको दुख नहीं होता?”
सुषीला बोली, “दुख तब होता है, जब किसी का दुख देखकर भी हम कुछ न करें।”
फिर वे स्कूल गए, जहाँ कुछ बच्चे फीस न होने से पढ़ नहीं पा रहे थे। सुषीला ने उनके लिए कपड़े सिले, किताबें जुटाईं। रोहन देखता रहा—उसके चेहरे पर पहली बार किसी और की खुशी देखकर मुस्कान आई।
शाम को रोहन बोला, “दादी, आज मुझे अजीब-सी खुशी मिली, बिना कुछ पाए।”
सुषीला हँसी, “यही असली पाना है।”
कुछ महीनों बाद रोहन गाँव में ही रुक गया। उसने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, किसानों की मदद करने लगा। लोग कहते, “यह तो सुषीला का बनाया हुआ इंसान है।”
एक दिन सुषीला बीमार पड़ गई। गाँव के लोग उसके पास आए, किसी ने दवा लाई, किसी ने खाना। सुषीला की आँखों में आँसू थे—दुख के नहीं, संतोष के।
उसने धीरे से कहा,
“देखो, मैं सुख के पीछे नहीं भागी,
मैं फलदायक बनी, परोपकारी बनी,
सच्चाई-भलाई के साथ चली—
और जीवन अपने आप सफल हो गया।”
और उसी शांति के साथ, सुषीला ने दुनिया को अलविदा कहा—एक ऐसी मंज़िल पाकर, जहाँ सुख नहीं, अर्थ था।