पहाड़ी इलाके के बीच बसे गाँव का मुखिया था—चीफ रघुनाथ। लोग उसे “चीफ-चीफ” कहते थे, क्योंकि वह हर बात में खुद को सबसे ऊपर मानता था। उसके पास खेत थे, जंगल का हिस्सा था, सोने-चाँदी के गहने थे, और लोगों पर अधिकार भी। पर उसके मन में कभी शांति नहीं थी। जितना पाता, उससे ज़्यादा पाने की भूख उसे जलाती रहती।
रघुनाथ मानता था कि अगर वह मंदिर में ज़्यादा चढ़ावा चढ़ाएगा, तो देवता उसे और धन देंगे। वह हर महीने बड़ी पूजा करवाता, ब्राह्मणों को दान देता, पर भीतर से उतना ही बेचैन रहता। रात को सोते समय भी उसके दिमाग में यही चलता—किसका खेत हड़पा जाए, किससे कर बढ़वाया जाए।
एक दिन गाँव में एक साधारण-सा फकीर आया। फटे कपड़े, हाथ में लकड़ी की लाठी, आँखों में अजीब-सी गहराई। लोग उसे रोटी देने लगे। जब वह चीफ के दरवाज़े पहुँचा, तो रघुनाथ ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और बोला,
“कुछ काम जानते हो या सिर्फ़ माँगना आता है?”
फकीर मुस्कुराया, “नेचर में हमेशा ‘दो और लो’ का सिद्धांत है। जो देता है, वही पाता है।”
रघुनाथ हँस पड़ा, “मैं तो रोज़ देता हूँ—दान, पूजा, चढ़ावा। फिर भी शांति क्यों नहीं मिलती?”
फकीर बोला, “क्योंकि तुम देते नहीं, दिखाते हो। और लेते बहुत हो—बिना सोचे, बिना रुके।”
रघुनाथ को गुस्सा आया और उसने फकीर को भगा दिया।
कुछ ही दिनों बाद गाँव में सूखा पड़ गया। नदी सूखने लगी, फसलें जलने लगीं। लोग परेशान हो गए। चीफ के पास अनाज भरा था, पर उसने भंडार खोलने से मना कर दिया। बोला, “जब कीमत बढ़ेगी, तब बेचूँगा।”
लोग भूखे रहने लगे। बच्चे रोने लगे। उसी रात रघुनाथ को सपना आया—वह सोने के ढेर पर बैठा है, पर चारों तरफ़ आग लगी है। सोना पिघल रहा है, हाथ जल रहे हैं, और कोई मदद को नहीं आ रहा।
सुबह उठा तो दिल घबराया हुआ था। तभी वही फकीर फिर दिखा। रघुनाथ ने पूछा,
“क्या यह किसी देवता का संकेत था?”
फकीर बोला,
“कोई देवता तुम्हारी नीचता दूर किए बगैर तुम्हें मन की स्थायी शांति नहीं दे सकता।
लालच और पैसे की भूख तुमसे मांगे बगैर, तुममें संतोष धन नहीं दे सकता।”
रघुनाथ चुप हो गया। पहली बार उसे अपने भीतर की गंदगी दिखी। वह सीधे भंडारगृह गया और अनाज खोल दिया। बोला, “सबको बराबर मिलेगा।”
लोग रो पड़े। किसी ने उसके पैर छुए, किसी ने आशीर्वाद दिया। उसी दिन उसके दिल का बोझ हल्का हो गया। उसे लगा जैसे साँस लेना आसान हो गया हो।
फकीर ने कहा,
“देखा? नेचर का नियम है—दो और लो।
तुमने दिया, तो शांति मिली।
पहले तुम लेते थे, इसलिए भीतर खाली रहते थे।”
उस दिन के बाद रघुनाथ बदला हुआ इंसान बन गया। वह अब चीफ-चीफ नहीं रहा—बस लोगों का सेवक बन गया। और पहली बार, उसके पास बहुत कुछ होते हुए भी, उसका मन सच में संतोष से भर गया।