लघु कथा – 66

गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में मोहन रहता था। देखने में वह साधारण था, पर उसके भीतर एक असाधारण भ्रम पलता था—उसे लगता था कि वह सबसे बड़ा है, सबसे समझदार है, और सबसे योग्य है। सच यह था कि उसके पास न धन था, न विद्या, न अनुभव; पर अहंकार ऐसा था जैसे उसके सिर पर अदृश्य ताज सजा हो।
मोहन छोटी-छोटी बातों पर लोगों को नीचा दिखाने में आनंद लेता। किसी ने नया कपड़ा पहन लिया, तो कहता, “कपड़े से क्या होता है, आदमी तो दिमाग से बड़ा होता है—और वह तो मेरे पास ही है।” कोई मेहनत करके आगे बढ़ता, तो वह कहता, “किस्मत होगी उसकी, काबिलियत थोड़े ही।” लोग मुस्कुरा कर टाल देते, पर भीतर ही भीतर उसे टेढ़ी नज़र से देखने लगे।
एक दिन गाँव में एक बूढ़ा साधु आया। चेहरे पर शांति थी और आँखों में गहराई। लोग उसके पास सलाह लेने आने लगे। मोहन को यह अच्छा न लगा। उसे लगा, “यह बूढ़ा कौन होता है सबको रास्ता दिखाने वाला?” वह साधु के पास गया और बोला, “बाबा, लोग आपको बहुत बड़ा मानते हैं, पर सच बताइए—आपको आता ही क्या है?”
साधु मुस्कुराया और बोला, “बेटा, मैं तो खुद को बहुत छोटा मानता हूँ। सीखने के लिए ही तो जी रहा हूँ।”
मोहन हँस पड़ा, “छोटा मानते हो, इसलिए छोटे ही रह गए। मैं खुद को बड़ा मानता हूँ, इसलिए बड़ा बनूँगा।”
साधु ने कहा, “ठीक है, कल सुबह तालाब पर आना, एक बात दिखाऊँगा।”
अगली सुबह मोहन पहुँचा। साधु उसे तालाब के किनारे ले गया और बोला, “इस पानी में अपना चेहरा देखो।”
मोहन ने देखा—पानी शांत था, चेहरा साफ दिख रहा था।
साधु ने एक पत्थर फेंका। लहरें उठीं, चेहरा टूट गया, बिगड़ गया।
साधु बोला, “जब मन शांत और विनम्र होता है, तब सच्ची पहचान दिखती है। जब अहंकार की लहरें उठती हैं, तो आदमी खुद को भी सही नहीं देख पाता।”
मोहन को बात चुभी, पर वह चुप रहा।
कुछ दिन बाद गाँव में अकाल पड़ा। अनाज कम था। लोग मिलकर काम करने लगे—कुएँ की मरम्मत, खेतों की सफाई, अनाज का बँटवारा। मोहन ने सोचा, “मैं क्यों काम करूँ? मैं तो इनसे बड़ा हूँ।” वह अलग बैठा रहा।
जब अनाज बँटा, तो उसे सबसे कम मिला। वह गुस्से में बोला, “यह अन्याय है!”
लोगों ने कहा, “तुमने साथ नहीं दिया, इसलिए तुम्हें बराबरी कैसे मिले?”
उस रात मोहन भूखा सोया। उसे साधु की बात याद आई—“जो खुद को बड़ा समझता है, वह अकेला रह जाता है।” पहली बार उसके भीतर कुछ टूटा।
अगले दिन वह लोगों के पास गया और बोला, “मुझसे गलती हो गई। मैं खुद को बड़ा समझता रहा, पर तुम सबके बिना मैं कुछ नहीं।” लोगों ने उसे काम में लगा लिया।
धीरे-धीरे मोहन बदलने लगा। वह सुनना सीख गया, झुकना सीख गया। अब लोग उसकी इज़्ज़त करने लगे—इसलिए नहीं कि वह खुद को बड़ा समझता था, बल्कि इसलिए कि वह खुद को छोटा मानने लगा था।
और मोहन ने समझ लिया—
मनुष्य जितना छोटा होता है, उसका अहंकार उतना ही बड़ा होता है;
और जो सच में बड़ा होता है, उसके भीतर अहंकार के लिए जगह ही नहीं होती।

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Rajeev Verma

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