लघु कथा – 64

गाँव के सबसे पीछे, घास-फूस की छोटी-सी झोपड़ी में रामलाल नाम का बूढ़ा आदमी रहता था। उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ थीं और आँखों में समय की थकान झलकती थी, लेकिन उसकी मुस्कान में अजीब सी गर्माहट थी, जो गाँव के लोगों के दिल तक पहुँचती। उम्र ज्यादा हो चुकी थी, पर जीवन की कठिनाइयों ने उसे कठोर नहीं, बल्कि दयालु बना दिया था।
रामलाल के पास न दौलत थी, न कोई बड़ी संपत्ति। उसकी झोपड़ी में केवल एक टूटे पलंग, कुछ कपड़े और अनाज के थैले थे। पर उसका दिल इतना बड़ा था कि वह हमेशा दूसरों के दुःख-सुख को महसूस करता। गाँव के लोग अक्सर हैरान होकर पूछते, “इतना गरीब आदमी, और इतना खुश कैसे रह सकता है?” रामलाल हँसकर कहता, “खुशी दौलत में नहीं, दूसरों की मदद में है।”
एक दिन तेज बारिश हुई। नदियाँ उफान पर थीं और गाँव में पानी घुस गया। लोग डर के मारे अपने घरों को छोड़कर भागने लगे, पर रामलाल ने अपनी झोपड़ी छोड़कर मदद करना शुरू कर दी। उसने बच्चों के लिए सूखे कपड़े इकट्ठा किए, बूढ़ों को अपने पास बुलाया और अपने पास जितना था, बाँट दिया।
पास के खेत में उसने देखा कि बूढ़ी महिला फँसी हुई है। रामलाल की थकी हुई पीठ और भीगते कपड़े, उसके साहस को नहीं रोक सके। उसने महिला को अपने हाथों में उठाया और सुरक्षित किनारे तक पहुँचाया। महिला की आँखों में आंसू थे, पर रामलाल की मुस्कान ने उसके डर को मिटा दिया।
गाँव के बच्चे अक्सर उसके पास आते। कोई दुखी होता, कोई भूखा। रामलाल हाथ में थोड़ा-सा अन्न लेकर उन्हें बाँट देता और कहता, “इन्सान के रूप में जन्म लेना बड़ी जिम्मेदारी है। जितना हो सके, दूसरों के दुःख को महसूस करो और मदद करो। यही असली संपत्ति है।”
कुछ समय बाद, गाँव के मुखिया ने रामलाल की मदद के लिए गाँव वालों से कुछ पैसे और कपड़े इकट्ठा किए। रामलाल मुस्कराया और बोला, “इनाम की मुझे ज़रूरत नहीं। खुशी इस बात में है कि किसी का दुःख कम कर पाया।”
समय बीतता गया। रामलाल बूढ़ा हो गया, पर उसकी कहानियाँ गाँव में पीढ़ियों तक सुनाई जाती रहीं। बच्चे उसे देखकर सीखते थे कि इन्सान के रूप में जन्म लेना सिर्फ जीने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के दुःख-सुख को महसूस करने और सहारा देने के लिए भी है।
रामलाल ने जीवन में कभी शिकायत नहीं की—न गरीबी से, न अकेलेपन से। उसने समझ लिया था कि हर क्रिया हमारे हाथ में नहीं होती, लेकिन हर प्रतिक्रिया और हर जवाब हमारे हाथ में है। यदि इंसान अपने हृदय से दूसरों के दुःख को महसूस करे और सही समय पर मदद करे, तो यही असली मानवता है।
गाँव वाले अक्सर कहते, “रामलाल ने हमें सिखाया कि असली ताकत दौलत में नहीं, बल्कि दिल की अच्छाई में है।”
और रामलाल, अपनी छोटी-सी झोपड़ी में, हर रात यही सोचकर सोता कि कल फिर किसी की मदद कर सकता है, क्योंकि इंसान के रूप में जन्म लेना सिर्फ जीने का मौका नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में प्रकाश डालने का उपहार भी है।

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Rajeev Verma

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