लघु कथा – 63

हरि धीरे-धीरे आँगन की झुर्रियों भरी कुर्सी पर बैठे। उनकी आँखें दूर क्षितिज की ओर थीं, लेकिन मन भीतर से अशांत था।
सुनहरी उनके पास आई, हाथ थामते हुए बोली, “हरि, क्या सोच रहे हो? ऐसा लग रहा है जैसे तुम दूर कहीं खो गए हो।”
हरि ने धीमी आवाज़ में कहा, “सुनहरी… मुझे लगता है हमारी आत्मा अब सर्दी-गर्मी की तरह अस्थिर हो गई है। कभी हमारी कामवासना हमें जलाती है, कभी जलन और कुढ़न। लगता है जैसे सहारा के रेगिस्तान में इंसान अकेला हो और सूरज लगातार उसे झुलसा रहा हो।”
सुनहरी ने गहरी साँस ली और कहा, “हाँ, हरि। मुझे भी यही महसूस होता है। हमारी छोटी-छोटी ईर्ष्याएँ, हमारे भीतर के अहंकार… यह केवल हमें ही नहीं, बल्कि हमारे बच्चों और आस-पड़ोस वालों को भी प्रभावित करता है। कभी-कभी तो लगता है कि हम खुद ही अपने जीवन को पीड़ा दे रहे हैं।”
हरि ने हल्का मुस्कुराते हुए कहा, “याद है, जब हम जवान थे, तब हमारी भावनाएँ इतनी सरल और साफ़ थीं। हर खुशी में हम नाचते-गाते, हर दुख में एक-दूसरे का हाथ थाम लेते। अब… अब छोटी-छोटी बातें भी हमारी आत्मा को झुलसा देती हैं।”
सुनहरी ने प्यार से कहा, “तो क्यों न हम अपने भीतर की यह तपिश कम करें? जैसे रेगिस्तान में थोड़ी-सी छाया और पानी इंसान को बचा सकते हैं, वैसे ही प्रेम और धैर्य हमारी आत्मा को शांति दे सकते हैं।”
हरि ने आंखों में चमक के साथ कहा, “सही कहा, सुनहरी। हमें अपनी जलन, क्रोध और अहंकार को पहचानना होगा। जब हम ऐसा करेंगे, हमारी आत्मा ठंडी होगी, और हमारे आसपास की आत्माएं भी शांति महसूस करेंगी।”
अगले हफ्तों में, हरि और सुनहरी ने अपने जीवन में बदलाव लाना शुरू किया। छोटे-छोटे अच्छे काम करने लगे, बच्चों के प्रति समझ और प्रेम बढ़ाया, और गाँव के विवादों में धैर्य और समझदारी अपनाई।
एक दिन हरि ने अपनी पत्नी से कहा, “सुनहरी… मुझे लगता है हमारी आत्माएँ अब शांति महसूस कर रही हैं। पहले जैसी तपिश नहीं रही।”
सुनहरी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, हरि। अब हमारी ईर्ष्या और क्रोध हमें जला नहीं रहे। हमारी आत्माएँ अब उस रेगिस्तान की तरह नहीं हैं जो हर पल सूरज की तपिश सहती हो, बल्कि एक ओएसासिस की तरह हैं, जहाँ प्यार और शांति का पानी बह रहा है।”
हरि ने हाथ पकड़कर कहा, “देखो, हमने अपने भीतर की गर्मी को ठंडा कर दिया। अब हम शांति के साथ मुस्कुरा सकते हैं।”
सुनहरी ने हल्की हँसी के साथ उत्तर दिया, “अब हमें समझ आ गया है—उच्च और नीच भावों को समझना और उन्हें नियंत्रित करना ही असली जीवन की राह है।”
और इस तरह, हरि और सुनहरी ने अपने जीवन को प्रेम, धैर्य और आत्मिक संतुलन से भर दिया। सहारा के रेगिस्तान की तपिश से दूर, अपने ओएसासिस में, जहाँ हर दिन की धूप भी अब केवल हल्की गर्मी और उजाला देती थी, न कि जलन।

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Rajeev Verma

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