लघु कथा – 60

रवि और अमन बचपन के दोस्त थे। एक ही गली में पले, एक ही स्कूल में पढ़े और आज भी उसी शहर में रहते थे, बस ज़िंदगी उन्हें अलग-अलग रास्तों पर ले आई थी। रवि अब एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था, और अमन एक छोटा-सा चाय का ठेला चलाता था। पैसे और हैसियत में फर्क आ गया था, पर दोस्ती अब भी वैसी ही थी।
एक शाम दोनों नदी किनारे बैठे थे। सूरज ढल रहा था और पानी पर सुनहरी रोशनी बिखरी हुई थी। अमन ने चाय का कुल्हड़ रवि की तरफ बढ़ाया और बोला,
“यार, लोग कहते हैं—बेकसूर कौन होता है इस ज़माने में… बस सबके गुनाह पता नहीं चलते।”
रवि कुछ देर चुप रहा। फिर बोला,
“सच है। लोग दूसरों को जल्दी जज कर लेते हैं, पर अपने गुनाहों पर परदा डाल लेते हैं।”
अमन हँसा नहीं, बस गहरी साँस ली।
“तुझे पता है, लोग मुझे बड़ा सीधा समझते हैं। पर सच ये है कि मैं भी कभी बहुत गलत रास्ते पर था।”
रवि चौंका, “तू? तुझसे ज़्यादा शरीफ आदमी मैंने नहीं देखा।”
अमन ने नदी की तरफ देखते हुए कहा,
“शरीफ इसलिए हूँ क्योंकि मैंने गलत करके देख लिया है। कॉलेज के दिनों में मैं गलत संगत में पड़ गया था। छोटे-मोटे चोरी-चकारी, झूठ, और धोखा—सब किया। एक दिन एक आदमी की वजह से जेल जाते-जाते बचा। उसी रात मैंने खुद से कहा—बस, अब और नहीं।”
रवि को यकीन नहीं हो रहा था।
“पर किसी को पता क्यों नहीं चला?”
अमन मुस्कराया, “क्योंकि हर गुनाह शोर नहीं मचाता। कुछ चुपचाप इंसान के अंदर दब जाते हैं।”
अब रवि भी कुछ बेचैन हो गया। थोड़ी देर बाद बोला,
“तूने अपनी बात कह दी… अब मेरी सुन। लोग मुझे सफल और ईमानदार समझते हैं। पर सच ये है कि मेरी तरक्की में एक झूठ शामिल है।”
अमन ने उसकी तरफ देखा।
“कैसा झूठ?”
रवि बोला,
“एक बार ऑफिस में मेरे सीनियर ने गलती की थी। मैंने उसे सुधार दिया, पर सामने ऐसा दिखाया जैसे वो मेरी मेहनत थी। प्रमोशन मुझे मिल गया। वो आदमी कुछ नहीं बोला, पर उसकी आँखों में मैंने खुद को गिरते देखा।”
अमन ने धीरे से कहा,
“तो फिर तू खुद को बेकसूर समझता है?”
रवि ने सिर हिला दिया,
“नहीं। पर दुनिया मुझे बेकसूर मानती है।”
दोनों कुछ देर चुप बैठे रहे। हवा में सिर्फ नदी की आवाज़ थी।
अमन बोला,
“शायद इसी लिए कहा जाता है—इस ज़माने में बेकसूर कोई नहीं होता। फर्क बस इतना है कि किसी के गुनाह दिख जाते हैं, और किसी के छुपे रह जाते हैं।”
रवि ने कहा,
“पर क्या गुनाह छुपा लेने से वो खत्म हो जाता है?”
अमन ने मुस्कराकर जवाब दिया,
“नहीं। वो इंसान के अंदर रहकर उसे खाता रहता है, जब तक वो खुद को माफ़ नहीं कर ले और सुधर न जाए।”
रवि ने गहरी साँस ली।
“मैं उस आदमी से माफी माँगना चाहता हूँ।”
अमन ने उसका कंधा थपथपाया,
“और मैं चाहता हूँ कि मेरी पुरानी गलतियों से कोई और न भटके। इसलिए मैं बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता हूँ, ताकि वो वो रास्ता न चुनें जो मैंने चुना था।”
शाम गहरी हो गई थी। दोनों उठने लगे।
रवि बोला,
“आज समझ आया—बेकसूर होना शायद नामुमकिन है, पर अपने गुनाहों को पहचानकर बदल जाना मुमकिन है।”
अमन हँसा,
“हाँ दोस्त, गुनाह छुपाने से आदमी बड़ा नहीं बनता, उन्हें स्वीकार करके सुधरने से बनता है।”
दोनों अलग-अलग रास्तों पर चले गए, पर दिल में एक ही बात लेकर—
कि इस दुनिया में असली बहादुरी गुनाह न करना नहीं,
बल्कि गुनाह करके भी इंसान बने रहना है।

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Rajeev Verma

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