लघु कथा-6

आज फिर मन बहुत भारी है। बाहर लोग हँस रहे हैं, बातें कर रहे हैं, लेकिन मेरे भीतर जैसे कोई चुपचाप रो रहा है। ऐसा नहीं है कि मेरी ज़िंदगी में कुछ अलग या अनोखा दुख है। शायद वही दुख हैं जो सबके हिस्से आते हैं—पर जब वे दिल के बहुत पास आकर बैठ जाते हैं, तो सांस लेना भी भारी लगने लगता है।
घर में रहते हुए भी मैं अकेला महसूस करता हूँ। सब अपने-अपने कामों में इतने व्यस्त हैं कि किसी को यह देखने का समय नहीं कि मैं चुप क्यों रहता हूँ। जब मैं कुछ कहना चाहता हूँ, तो लगता है कि मेरी बात किसी के पास पहुँचने से पहले ही रास्ते में खो जाएगी। इसलिए मैंने बोलना कम कर दिया है। अब लोग कहते हैं, “तुम बदल गए हो।” काश वे जानते कि मैं बदला नहीं हूँ, बस टूटते-टूटते थक गया हूँ।
दोस्त भी अब पहले जैसे नहीं रहे। कभी जिनके साथ घंटों हँसता था, आज उनसे बात करने के लिए भी शब्द ढूँढने पड़ते हैं। किसी ने कहा, “तुम बहुत नेगेटिव हो गए हो।” किसी ने कहा, “हर बात पर उदास क्यों हो जाते हो?” उन्हें क्या पता कि कुछ उदासियाँ सवाल नहीं पूछतीं, बस आकर बैठ जाती हैं और जाने का नाम नहीं लेतीं।
आज एक वाक्य कहीं पढ़ा—
“खुश रहो, क्योंकि दुखी रहकर कौन-सा दुःख कम हो जाएगा?”
पहले तो मुझे गुस्सा आया। मन में आया कहूँ—अगर खुश रहना इतना आसान होता, तो कौन दुखी रहता? लेकिन फिर देर तक उसी वाक्य के बारे में सोचता रहा। सच में, मेरे उदास रहने से कौन-सी चीज़ बदल रही है? जिन लोगों ने मुझे दुख दिया, उन्हें तो फर्क भी नहीं पड़ता। जिनसे मुझे उम्मीद थी, वे अपनी दुनिया में खुश हैं। और मैं? मैं बस अपनी ही तकलीफ को रोज़ थोड़ा-थोड़ा बढ़ा रहा हूँ।
मैंने अपने कमरे की खिड़की खोली। बाहर हल्की हवा चल रही थी। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं, जैसे कह रही हों—“हम गिरते हैं, फिर भी हरे रहते हैं।” मुझे लगा, शायद ज़िंदगी भी यही सिखा रही है। गिरना गलत नहीं है, लेकिन गिरे रहना हमारी अपनी पसंद बन जाता है।
मैंने सोचा—मेरे दुख का कारण मेरे परिवार और मेरे दोस्त हैं, लेकिन मेरे सुख का कारण भी तो मैं खुद बन सकता हूँ। मैं यह तय कर सकता हूँ कि मैं हर बात को दिल में ज़हर बनाकर रखूँ या उसे अनुभव बनाकर आगे बढ़ जाऊँ।
मैं यह नहीं कह रहा कि मैं अचानक खुश हो गया हूँ। नहीं, दर्द अभी भी है। लेकिन आज पहली बार मैंने तय किया है कि मैं अपने दुख को ही अपनी पहचान नहीं बनने दूँगा। मैं अपने अंदर उस छोटे से बच्चे को ढूँढने की कोशिश करूँगा, जो बिना वजह हँस लिया करता था।
शायद मैं कल भी उदास रहूँ। शायद परसों भी। लेकिन अब मैं हर दिन खुद से यह पूछूँगा—
“क्या मेरी उदासी किसी का भला कर रही है?”
और अगर जवाब “नहीं” हुआ, तो मैं कोशिश करूँगा… बस थोड़ी सी कोशिश… कि मैं मुस्करा सकूँ। क्योंकि सच में—दुखी रहकर कौन-सा दुःख कम हो जाएगा?

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Rajeev Verma

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