लघु कथा – 58

शहर के पुराने हिस्से में एक छोटा-सा घर था, जहाँ मदम और सुनित अपने दो बच्चों के साथ रहते थे। घर साधारण था, पर सपने बड़े थे। मदम एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था और सुनित गृहिणी थी। बाहर से देखने पर सब ठीक लगता था, पर भीतर धीरे-धीरे दरारें पड़ रही थीं।
सुनित बहुत भावुक थी, पर समझदारी में कमजोर। छोटी-छोटी बातों को दिल पर ले लेती। अगर मदम देर से आता, तो वह सोचती—“शायद अब उसे मेरी परवाह नहीं।” अगर सास ने कुछ कह दिया, तो उसे लगता—“इस घर में मेरी कोई इज्जत नहीं।” वह बिना सोचे-समझे बोल जाती, कभी बच्चों के सामने, कभी पड़ोसियों के सामने। बात बढ़ती जाती।
मदम मेहनती था, पर समझदार नहीं। वह सोचता—“मैं कमाता हूँ, बस यही काफी है।” सुनित की भावनाओं को वह कमजोरी समझता। जब सुनित रोती, वह कहता—“ड्रामा मत करो।” जब वह शिकायत करती, तो मदम चुप हो जाता या गुस्से से जवाब देता—“तुम कभी खुश रह ही नहीं सकती।”
धीरे-धीरे घर में बात कम और तकरार ज़्यादा होने लगी। बच्चों ने हँसना कम कर दिया। बेटी डरने लगी, बेटा चिड़चिड़ा हो गया। घर जो कभी सुकून देता था, अब बोझ लगने लगा।
एक दिन सुनित का धैर्य टूट गया। सास ने बस इतना कहा, “आज सब्ज़ी ठीक नहीं बनी।” सुनित रोते हुए बोली, “मुझसे कुछ भी ठीक नहीं होता, यही समझो।” और वह बच्चों को लेकर मायके चली गई।
मदम को लगा, “चली गई तो गई, दो दिन में खुद लौट आएगी।”
पर दिन बीतते गए, सुनित नहीं आई।
इधर सुनित मायके में भी खुश नहीं थी। माँ ने कहा, “बेटी, हर बात पर टूट जाना समझदारी नहीं। घर सिर्फ भावनाओं से नहीं चलता, सोच से चलता है।”
सुनित पहली बार चुप रही। उसे लगा—शायद वह भी हर बार आग में घी डाल देती थी।
उधर मदम के घर में सन्नाटा था। बच्चों की आवाज़, सुनित की झुंझलाहट, सब याद आने लगा। उसने महसूस किया—कमाना ही सब कुछ नहीं होता। किसी के मन को समझना भी जिम्मेदारी है।
एक दिन वह सुनित के मायके गया। न गुस्सा, न शिकायत। बस बोला,
“मैंने तुम्हें कभी समझने की कोशिश नहीं की। मैं सोचता था, मैं सही हूँ। शायद तुम भी हर बात को बहुत दिल से लगा लेती हो। पर अगर हम दोनों न बदलें, तो घर नहीं बचेगा।”
सुनित की आँखों में आँसू थे। उसने कहा,
“मैं भी हर बात पर टूट जाती हूँ। सोचती नहीं, बस महसूस करती हूँ। शायद इसी से घर कमजोर हुआ।”
दोनों ने तय किया—
सुनित भावनाओं के साथ समझदारी जोड़ेगी।
मदम जिम्मेदारी के साथ संवेदना जोड़ेगा।
वे लौट आए। घर धीरे-धीरे फिर से घर बनने लगा। तकरार कम हुई, बात बढ़ी। बच्चे फिर हँसने लगे।
लोग कहते हैं—
अगर घर की स्त्री समझदार न हो, तो घर टूट जाता है।
और अगर पुरुष समझदार न हो, तो उस घर की स्त्री टूट जाती है।
पर जब दोनों समझदार बनें—तभी घर सच में बसता है।

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Rajeev Verma

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