शिवू काका को पूरे गाँव में लोग “शांत सरोवर” कहते थे। उम्र अस्सी साल, सफ़ेद बाल, काँपते हाथ, लेकिन मन बिल्कुल स्थिर। कोई कितना भी कड़वा बोल दे, उनका चेहरा वैसा ही रहता—शांत।
लोग पूछते, “काका, गुस्सा आता ही नहीं?”
वह मुस्कराकर कहते, “आता है, पर टिकता नहीं।”
एक दिन गाँव में नई सड़क बन रही थी। ठेकेदार ने काका की ज़मीन का थोड़ा-सा हिस्सा बिना पूछे घेर लिया। काका कुछ बोले नहीं। गाँव के नौजवान भड़क गए।
“काका, चुप क्यों हैं? लड़ो! कोर्ट चलो!”
काका ने बस इतना कहा, “पहले बात करेंगे।”
वे ठेकेदार के पास गए। ठेकेदार अकड़ में बोला, “जो होना है हो गया, अब कुछ नहीं बदल सकता।”
काका शांत रहे, “बदल सकता है, अगर मन बदले।”
ठेकेदार ने उन्हें धक्का-सा दिया। लोग भड़क गए।
“काका, अब तो बोलो!”
काका बोले, “अगर मैं भी आग बन जाऊँ, तो बुझाएगा कौन?”
अगले दिन काका फिर गए—इस बार कुछ काग़ज़ और गाँव वालों की सहमति लेकर। उन्होंने बिना चिल्लाए, बिना गाली दिए, बस सच्चाई रखी। ठेकेदार ने देखा—यह आदमी न डरता है, न लड़ता है। उसे अपनी गलती समझ आ गई। उसने ज़मीन लौटा दी।
गाँव में चर्चा फैल गई—
“काका ने बिना झगड़े काम करा दिया।”
एक लड़का आया और बोला,
“काका, आप डरते नहीं?”
काका बोले, “डर तो सबको लगता है, पर मैं डर को डूबने देता हूँ, तैरने नहीं।”
लड़का बोला, “आप ऐसे कैसे बन गए?”
काका कुछ देर चुप रहे, फिर बोले,
“मैंने बहुत आग जलाई है—गुस्से की, बदले की। सब जल गया, बस मैं बचा। तब समझ आया—जो खुद जलता है, वही दूसरों को जलाता है।”
अब गाँव में जब भी कोई झगड़ा होता, लोग काका को बुलाते। वह बस दोनों पक्षों को सुनते, फिर शांत-सा समाधान बता देते।
एक दिन किसी ने कहा,
“काका, आप तो सच में शांत सरोवर हैं।”
काका मुस्कराए,
“इसलिए खुश हूँ। क्योंकि जो खुद को ठंडा रखता है, वही दुनिया की आग बुझा सकता है।”