शर्मा जी सुबह से ही परेशान थे। अख़बार के पहले पन्ने पर बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ थीं—सेंसेक्स ऊँचाई पर, सोना और महँगा, ज़मीन-घर के दाम आसमान छूते हुए। शर्मा जी ने गहरी साँस ली और बोले, “अब आदमी लगाए तो लगाए कहाँ? सब कुछ इतना महँगा हो गया है।”
उनकी पत्नी वंदना ने रसोई से जवाब दिया, “लगाने की फिक्र छोड़ो, पहले चाय तो ठीक से पी लो, ठंडी हो गई है।”
शर्मा जी ने ध्यान ही नहीं दिया। उनके दिमाग में बस शेयर और रेट घूम रहे थे।
तभी उनके दोस्त गुप्ता जी आ गए। वे हमेशा हँसमुख रहते थे। शर्मा जी को ऐसे परेशान देखकर बोले, “लगता है आज शेयर बाज़ार ने आपकी नींद भी ले ली।”
शर्मा जी बोले, “यार, समझ नहीं आता, निवेश कहाँ करूँ। सब कुछ इतना महँगा हो गया है कि आदमी सोचता ही रह जाए।”
गुप्ता जी हँसते हुए बोले, “तुमने एक जगह कोशिश की है?”
“कहाँ?”
“रिश्तों में।”
शर्मा जी को लगा दोस्त मज़ाक कर रहा है। “उसमें क्या मिलेगा?”
गुप्ता जी बोले, “सबसे बढ़िया रिटर्न।”
उस दिन शर्मा जी ने सोचा, चलो, देख लेते हैं। सबसे पहले उन्होंने घर आकर पत्नी से कहा, “आज तुम रसोई मत सँभालो, बाहर से खाना मंगा लेते हैं।”
वंदना हैरान रह गई, “आज कौन-सा शेयर गिर गया?”
फिर शर्मा जी बेटे के पास गए और बोले, “चल, साथ बैठकर खेलते हैं।”
बेटा बोला, “पापा, आप ठीक तो हैं?”
शाम को शर्मा जी अपनी बूढ़ी माँ के पास बैठ गए। माँ ने बस इतना कहा, “बहुत अच्छा लगा, बेटा, आज तू मेरे पास बैठा।”
अगले दिन शर्मा जी ने पड़ोसी मिश्रा जी से हालचाल पूछा, जिनसे वे महीनों से सिर्फ “नमस्ते” तक सीमित थे। मिश्रा जी खुश होकर बोले, “आज तो शर्मा जी बड़े बदले-बदले लग रहे हैं।”
कुछ ही दिनों में घर का माहौल बदल गया। पहले जहाँ सब अपने-अपने मोबाइल में लगे रहते थे, अब बातें होने लगीं। बेटा खुद आकर अपनी बातें बताने लगा। वंदना भी खुश रहने लगी।
एक दिन शर्मा जी ने गुप्ता जी से कहा, “यार, ये कैसा निवेश है? बिना पैसे लगाए, रोज़ फायदा हो रहा है।”
गुप्ता जी बोले, “और सबसे अच्छी बात—न घाटा, न टैक्स।”
उस शाम शर्मा जी फिर अख़बार पढ़ रहे थे। वंदना ने पूछा, “आज क्या हाल है सेंसेक्स का?”
शर्मा जी मुस्कराए, “ऊँचा ही होगा। सोना भी महँगा होगा, घर भी सस्ते नहीं होंगे।”
फिर बोले, “पर अब मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैंने सबसे सुरक्षित जगह पैसा लगा दिया है।”
“कहाँ?”
“रिश्तों, भावनाओं और दोस्ती में।”
बेटा हँसते हुए बोला, “और रिटर्न?”
शर्मा जी बोले, “इतना कि अब दिल अमीर हो गया है।”
अब शर्मा जी रोज़ थोड़ा समय, थोड़ी मुस्कान और थोड़ा अपनापन इसी निवेश में लगाते हैं। उन्हें समझ आ गया है कि जब दिल का खाता भरता है, तब ज़िंदगी सच में मुनाफ़े में चलती है।