अंकिता सोलह साल की थी—तेज़ दिमाग़ वाली, बातों की जादूगर। स्कूल में उसे सब “स्मार्ट गर्ल” कहते थे। वह शब्दों से लोगों को हँसा भी सकती थी, चुप भी करा सकती थी, और जीत भी सकती थी। बहस हो या भाषण प्रतियोगिता—अंकिता हमेशा आगे रहती।
उसके शिक्षक कहते,
“तुम शब्दों से दुनिया जीत सकती हो।”
अंकिता को यह बात बहुत पसंद थी।
पर एक चीज़ वह नहीं समझती थी—दिल।
उसकी क्लास में नीलम नाम की लड़की थी—शांत, सीधी और बहुत संवेदनशील। वह ज़्यादा नहीं बोलती थी, पर जब बोलती, तो सच बोलती। एक दिन अंकिता ने मज़ाक में उसके बनाए चार्ट की आलोचना कर दी। शब्द चुभने वाले थे, पर अंकिता को लगा वह बस स्मार्ट बन रही है।
नीलम चुप रही, पर उसकी आँखें भर आईं।
अगले दिन नीलम स्कूल नहीं आई। पता चला उसकी माँ अस्पताल में थी। अंकिता को थोड़ा अजीब लगा। उसने सोचा, “मैंने शायद ज़्यादा बोल दिया।”
उस दिन स्कूल में भाषण प्रतियोगिता थी। अंकिता ने मंच पर खड़े होकर शानदार भाषण दिया। तालियाँ बजीं, टीचर खुश हुए। पर अंकिता के दिल में कुछ खाली था। उसे नीलम याद आ रही थी।
शाम को उसने नीलम के घर जाने की हिम्मत की। उसके पास कोई बड़ा भाषण नहीं था, न कोई चालाक शब्द। बस बोली,
“मुझे बुरा लग रहा है कि मैंने तुम्हें दुखी किया। मैं मज़ाक में बोल गई थी।”
नीलम ने धीरे से कहा,
“शब्द चोट करते हैं, अंकिता। कभी-कभी बहुत गहरी।”
अंकिता पहली बार चुप हो गई। उसने महसूस किया—शब्द जीत दिला सकते हैं, पर दिल नहीं।
कुछ दिन बाद नीलम की माँ ठीक होकर घर आ गई। अंकिता रोज़ रास्ते में नीलम का बैग उठा लेती, उसकी मदद करती, बिना दिखावे के। न कोई चालाक बात, न कोई मज़ाक—बस सादा व्यवहार।
धीरे-धीरे नीलम मुस्कराने लगी।
एक दिन उसने कहा,
“अब तुम्हारे शब्द कम, दिल ज़्यादा बोलता है।”
अंकिता समझ गई थी—
दिमाग़ से प्रतियोगिता जीती जाती है,
पर दिल से रिश्ते।
अब भी वह भाषण में जीतती थी, पर उसकी असली जीत तब होती थी, जब कोई उदास दोस्त उसकी वजह से हँस पड़ता।
स्कूल के फेयरवेल में अंकिता ने आख़िरी भाषण दिया। उसने कहा,
“हम शब्दों और दिमाग़ से दुनिया जीत सकते हैं,
पर अगर दिल से नहीं जीते,
तो सब जीत अधूरी रह जाती है।”
नीलम सबसे ज़्यादा ताली बजा रही थी।
अंकिता मुस्कराई—
आज वह सिर्फ स्मार्ट नहीं थी,
समझदार भी थी।