रघुवीर को कस्बे में सब “मुस्कुराता आदमी” कहते थे। कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ से आया, कब आया—बस इतना जानते थे कि जहाँ रघुवीर होता, वहाँ उदासी टिक नहीं पाती।
वह अक्सर कहता,
“जन्म और मौत पर मेरा ज़ोर नहीं चलता, पर आज कैसे जीना है—यह मेरी मर्ज़ी है।”
रघुवीर रिक्शा चलाता था। दिन भर मेहनत करता, पर चेहरे पर शिकन नहीं आने देता। कोई किराया कम दे देता, तो कहता,
“अरे भाई, अगली बार ज़्यादा दे देना, आज मुस्कान दे दो।”
लोग सोचते, यह आदमी बहुत खुशकिस्मत होगा। पर सच्चाई यह थी कि उसकी ज़िंदगी आसान नहीं थी। बचपन में माँ चल बसी थी, पिता शराब में डूब गए थे। रघुवीर ने बहुत कम उम्र में काम शुरू कर दिया था। दुख उसे भी मिला था, पर उसने दुख को अपने ऊपर राज नहीं करने दिया।
एक दिन उसकी रिक्शा में सीमा नाम की लड़की बैठी। वह रो रही थी।
“क्या हुआ बहन?” रघुवीर ने पूछा।
“सब खत्म हो गया,” उसने कहा, “नौकरी चली गई, घर में झगड़े, कुछ समझ नहीं आ रहा।”
रघुवीर ने रिक्शा रोककर कहा,
“देखो, जो होना था, हो गया। पर आज साँस चल रही है, यह तो हमारे हाथ में है। आज को मुस्कुरा कर जी लो, कल अपने आप रास्ता दिखा देगा।”
सीमा ने पहली बार उस दिन रोते-रोते हँसने की कोशिश की।
धीरे-धीरे रघुवीर पूरे इलाके का अपना आदमी बन गया। किसी की शादी हो, वह गाना गा देता। किसी की दुकान बंद हो जाए, वह चुटकुला सुना देता। किसी के घर मौत हो जाए, वह चुपचाप बैठकर साथ देता—बिना उपदेश, बिना दिखावे।
एक दिन वह खुद बीमार पड़ गया। डॉक्टर ने कहा,
“दिल कमजोर है। ज़्यादा तनाव मत लेना।”
रघुवीर हँस पड़ा,
“डॉक्टर साहब, तनाव तो मेरे बस का नहीं, मुस्कान है।”
लोग बोले,
“अब तो हँसना छोड़ दो, बीमारी है।”
रघुवीर ने कहा,
“अगर हँसना छोड़ दूँ, तो जीना किसलिए?”
कुछ महीनों बाद एक रात वह सोते-सोते चला गया। कस्बे में अजीब सन्नाटा छा गया। वही लोग जो रोज़ उसके मज़ाक पर हँसते थे, आज चुप थे।
अगले दिन किसी ने उसकी रिक्शा पर एक कागज़ चिपका दिया था। उस पर लिखा था—
“जन्म और मौत हमारे हाथ में नहीं,
पर रघुवीर ने हमें सिखाया—
जीना हमारे हाथ में है।”
सीमा, जिसे उसने हँसना सिखाया था, अब स्कूल में पढ़ाती थी। उसने बच्चों से कहा,
“अगर कभी दुख आए, तो रघुवीर को याद करना। वह कहता था—मस्ती करना कोई अपराध नहीं, यह जीने की कला है।”
रघुवीर चला गया था, पर उसकी हँसी हवा में रह गई थी—
हर उस दिल में,
जिसे उसने कभी मुस्कुराया था।