लघु कथा – 53

प्रोफेसर अनिरुद्ध वर्मा शहर के सरकारी कॉलेज में पढ़ाते थे। उम्र पचास के करीब, चेहरे पर सादगी और आँखों में धैर्य। वे गणित के अध्यापक थे, पर पढ़ाते सिर्फ सूत्र नहीं थे—वे जीवन भी पढ़ाते थे।
हर साल रिज़ल्ट के दिन कॉलेज में एक ही माहौल होता। जिन बच्चों के नंबर अच्छे आते, उन्हें फूल, मिठाई और फोटो मिलते। जो फेल होते या कम नंबर लाते, वे चुपचाप सिर झुकाए निकल जाते। कोई यह नहीं पूछता कि किसने कितनी मेहनत की, किसने कितनी रातें जागकर पढ़ा।
उस साल रोहित नाम का छात्र प्रोफेसर वर्मा की क्लास में था। वह पढ़ाई में बहुत तेज़ नहीं था, पर मेहनती था। रोज़ लाइब्रेरी में बैठता, सवाल पूछता, बार-बार गलतियाँ करता और फिर सुधारता। प्रोफेसर वर्मा उसकी कोशिशों से खुश रहते।
रिज़ल्ट आया। रोहित बस पास हुआ—तीसरा दर्जा। उसके दोस्त अमन ने टॉप किया। सब अमन के घर बधाई देने गए। रोहित अकेला कॉलेज के मैदान में बैठा था, आँखों में आँसू।
प्रोफेसर वर्मा उसे देखकर पास आए।
“क्या हुआ, रोहित?”
“सर, मैंने इतना पढ़ा… फिर भी कुछ नहीं बना। सब मुझे नाकाम समझेंगे।”
वर्मा जी ने कहा,
“तुम्हें पता है लोग क्या देखते हैं?”
“नंबर,” रोहित बोला।
“हाँ, क्योंकि लोगों को परिणाम से मतलब होता है, प्रयास से नहीं। पर यह दुनिया का नज़रिया है, सच नहीं।”
रोहित चुप रहा।
कुछ दिन बाद कॉलेज में एक प्रतियोगिता हुई—गरीब बच्चों के लिए पढ़ाने की योजना। छात्रों को गाँव जाकर बच्चों को पढ़ाना था। अमन नहीं गया, बोला—“रिज़ल्ट खराब हो जाएगा, समय बर्बाद है।”
रोहित गया। रोज़ बस बदलकर गाँव पहुँचता, बच्चों को अक्षर सिखाता, खुद भी सीखता।
तीन महीने बाद वही बच्चे छोटे-छोटे वाक्य पढ़ने लगे। गाँव वालों ने कॉलेज को पत्र लिखा—
“रोहित नाम का लड़का हमारे बच्चों की ज़िंदगी बदल रहा है।”
कॉलेज में सभा हुई। प्रिंसिपल ने सबके सामने रोहित को बुलाया।
“इसने बिना किसी इनाम की उम्मीद के काम किया।”
तालियाँ बजीं। अमन चुप था।
सभा के बाद रोहित प्रोफेसर वर्मा के पास आया,
“सर, अब लोग मेरी तारीफ़ कर रहे हैं।”
वर्मा जी मुस्कराए,
“अब परिणाम दिख रहा है, इसलिए। पर असली बात यह है—जब कोई देख नहीं रहा था, तब भी तुम प्रयास कर रहे थे।”
रोहित बोला,
“तो क्या हमेशा परिणाम बेकार है?”
“नहीं,” वर्मा जी ने कहा, “पर परिणाम हमारे हाथ में नहीं होता। हमारे हाथ में सिर्फ मेहनत, ईमानदारी और कोशिश होती है। जो इन्हें पकड़ लेता है, वही असली विजेता होता है—चाहे दुनिया माने या न माने।”
कुछ साल बाद रोहित खुद शिक्षक बन गया। एक दिन उसके एक छात्र ने कहा,
“सर, मैं फेल हो गया हूँ, बेकार हूँ।”
रोहित ने वही बात दोहराई जो उसने सीखी थी—
“तू बेकार नहीं है। तू कोशिश कर रहा है, यही तेरी असली जीत है।”
और प्रोफेसर अनिरुद्ध वर्मा दूर से यह सब देखकर मन ही मन बोले—
“जब एक इंसान अपने प्रयास को सम्मान देने लगता है, तब परिणाम खुद झुककर उसके पीछे आ जाते हैं।”

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Rajeev Verma

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