जय गोपाल कस्बे के सबसे बुज़ुर्ग आदमी थे—पचहत्तर साल की उम्र, सफ़ेद दाढ़ी, सीधी चाल और आँखों में गहरी शांति। लोग उन्हें कभी साधु कहते, कभी पागल, तो कभी महान। पर जय गोपाल को इन शब्दों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
वह हर सुबह नदी किनारे जाकर बैठते। न पूजा का दिखावा, न प्रवचन—बस चुपचाप बहते पानी को देखते रहते। कुछ लोग आते, चरण छूते, कहते,
“बाबा, आप तो बहुत बड़े ज्ञानी हैं।”
जय गोपाल मुस्करा देते, जैसे यह बात उनके कानों तक पहुँची ही न हो।
उसी तरह कुछ लोग मज़ाक भी उड़ाते।
“इस उम्र में भी कुछ करता नहीं, बस बैठा रहता है। कामचोर है,”
कोई कहता, “दिमाग़ चल गया है।”
और जय गोपाल? वह वैसे ही शांत रहते।
एक दिन कस्बे में नया शिक्षक आया—रमेश। वह पढ़ा-लिखा था, सवाल पूछने वाला। उसने देखा कि लोग जय गोपाल को लेकर दो हिस्सों में बँटे हैं—कुछ पूजा करते हैं, कुछ हँसते हैं।
रमेश उनके पास गया और बोला,
“बाबा, लोग आपको कभी भगवान मानते हैं, कभी पागल। आपको बुरा नहीं लगता?”
जय गोपाल ने नदी की ओर देखते हुए कहा,
“नदी से पूछो, जब कोई उसे सुंदर कहे या गंदा कहे, तो क्या वह बहना छोड़ देती है?”
रमेश चुप हो गया।
कुछ दिन बाद कस्बे में एक सभा हुई। किसी नेता को बुलाया गया था। उसने मंच से कहा,
“इस कस्बे में एक महान आत्मा हैं—जय गोपाल जी।”
तालियाँ बजीं। लोगों ने जय गोपाल को आगे बुलाना चाहा।
जय गोपाल नहीं गए। लोग कहने लगे,
“इतना सम्मान मिल रहा है, और ये जा भी नहीं रहे!”
कोई बोला, “घमंड है।”
दूसरे दिन वही नेता किसी और जगह चला गया। लोग फिर जय गोपाल को भूल गए।
रमेश को यह सब अजीब लग रहा था। वह फिर उनके पास गया।
“बाबा, आपने सभा में जाने से इनकार क्यों किया? सब आपकी तारीफ़ कर रहे थे।”
जय गोपाल ने कहा,
“तारीफ़ भी एक रस्सी है, और निंदा भी। फर्क बस इतना है कि एक सोने की होती है, दूसरी लोहे की। पर दोनों बाँधती ज़रूर हैं।”
रमेश ने पूछा,
“तो आप खुद को क्या मानते हैं?”
जय गोपाल मुस्कराए,
“जो हूँ, वही हूँ। न तारीफ़ से बड़ा होता हूँ, न आलोचना से छोटा।”
एक दिन कस्बे में किसी ने अफ़वाह फैला दी कि जय गोपाल पाखंडी हैं। कुछ लोग उन पर चिल्लाने लगे।
“तू ढोंगी है!”
जय गोपाल शांत खड़े रहे।
रमेश गुस्से में आ गया,
“बाबा, आप कुछ कहते क्यों नहीं?”
जय गोपाल बोले,
“अगर मैं सच हूँ, तो झूठ की आवाज़ से क्यों डरूँ? और अगर मैं झूठ हूँ, तो सच की आवाज़ से क्यों बचूँ?”
धीरे-धीरे रमेश समझने लगा—
जिसे अपनी सच्चाई का पता हो, वह दूसरों की राय का गुलाम नहीं होता।
कुछ साल बाद रमेश ने कहीं लिखा—
“जय गोपाल ने मुझे सिखाया कि जो खुद को जान लेता है, उसे न तो आलोचना भटका सकती है, न सराहना बहला सकती है।”
और जय गोपाल?
वह आज भी नदी किनारे बैठते हैं—
न तारीफ़ के इंतज़ार में,
न निंदा के डर में—
बस अपने होने में पूरे।