लघु कथा – 51

रवि और नीरज पुराने दोस्त थे। दोनों एक ही शहर में रहते थे, पर ज़िंदगी की दौड़ में मिलना कम हो गया था। एक शाम अचानक नीरज का फोन आया,
“चल, चाय पीते हैं। बहुत दिनों से कुछ दिल से बात नहीं हुई।”
चाय की दुकान पर बैठते ही नीरज ने मोबाइल निकालकर रवि को एक तस्वीर दिखाई। उस पर लिखा था—
“यात्रा करो और किसी को मत बताओ… लोग सुंदर चीज़ों को बर्बाद कर देते हैं।”
रवि मुस्कराया, “अजीब बात है। अच्छी चीज़ें सबको बतानी चाहिए, छुपानी क्यों?”
नीरज ने गहरी साँस ली, “तू नहीं समझेगा। हर सुंदर चीज़ को नज़र लगती है।”
रवि हँस पड़ा, “ये सब बहाने हैं। अगर कुछ अच्छा है, तो दूसरों से बाँटने में क्या बुराई?”
नीरज चुप हो गया। थोड़ी देर बाद बोला, “याद है कॉलेज के दिनों में मेरी वो यात्रा, जब मैं अकेला पहाड़ों पर गया था?”
“हाँ, तू रोज़ फोटो डालता था,” रवि बोला।
“बस वही मेरी गलती थी,” नीरज ने कहा। “लोगों की बातें, ताने, सलाह… सबने उस सफर का मज़ा खराब कर दिया। कोई बोला, पैसे क्यों उड़ा रहा है, कोई बोला, अकेले जाना गलत है। लौटकर मैं खुश था, पर भीतर कहीं टूट भी गया था।”
रवि ने चाय का घूँट लिया। “और प्रेम कहानी?” उसने मुस्कराकर पूछा।
नीरज की आँखों में हल्की नमी आ गई। “मैं एक लड़की से बहुत प्यार करता था। शुरू में सबको बताया—दोस्तों को, घरवालों को, सोशल मीडिया को। सबने अपनी-अपनी राय दी। कोई बोला जाति अलग है, कोई बोला करियर पहले, कोई बोला ये टिकेगा नहीं। धीरे-धीरे हम दोनों खुद पर शक करने लगे। आखिरकार वही हुआ जो दूसरों ने कहा था।”
रवि कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “तो तू कहना चाहता है कि खुशी भी छुपाकर जीनी चाहिए?”
नीरज ने सिर हिलाया, “हर खुशी नहीं, पर जो बहुत नाज़ुक हो, उसे। जैसे काँच की चीज़—हर हाथ में देने से टूट जाती है।”
रवि सोच में पड़ गया। उसे अपनी ज़िंदगी याद आई—हर छोटी सफलता वह सबको बताता था, हर रिश्ते की तस्वीर डालता था। और फिर वही चीज़ें या तो खत्म हो जातीं या फीकी पड़ जातीं।
वह धीरे से बोला, “शायद तू सही कह रहा है। लोग हमेशा बुरा नहीं चाहते, पर उनकी बातें हमारे मन में ज़हर घोल देती हैं।”
नीरज मुस्कराया, “इसलिए लिखा है—खुशी से जियो और किसी को मत बताओ। क्योंकि खुशी जब दिखावे में बदलती है, तो खुशी नहीं रहती, प्रदर्शन बन जाती है।”
रवि ने कहा, “पर कभी-कभी बाँटना भी ज़रूरी है।”
“हाँ,” नीरज बोला, “पर चुनकर। हर किसी को नहीं, सिर्फ उन्हें जो तोड़ें नहीं, सँभाल सकें।”
शाम ढलने लगी थी। दोनों उठे। रवि ने कहा, “मैं अब कुछ बातें अपने तक ही रखूँगा।”
नीरज हँस दिया, “बस यही सीख है—सुंदर चीज़ों को भी सहेजकर रखना आना चाहिए।”
दोनों अलग हुए, पर रवि के मन में वह पंक्तियाँ गूंजती रहीं—
कुछ खुशियाँ शोर नहीं चाहतीं,
उन्हें बस जीना होता है,
बताना नहीं।

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Rajeev Verma

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