राहुल और नीरजा की शादी को आठ साल हो चुके थे। बाहर से देखने पर उनकी ज़िंदगी सामान्य लगती थी—दो बच्चे, सुंदर घर, कामकाजी जीवन। लेकिन घर के भीतर माहौल हमेशा तनावपूर्ण रहता।
नीरजा एक ऐसी महिला थी जो अपने अधिकार और सम्मान के लिए हमेशा लड़ती। वह चाहती थी कि घर में हर बात उसके अनुसार हो। अगर राहुल ने किसी काम में छोटा सा भी निर्णय लिया, तो नीरजा तुरंत चिल्ला उठती। उसके लिए हर बात उसकी इच्छाओं के अनुसार होनी चाहिए थी।
राहुल हमेशा शांत रहने की कोशिश करता। वह जानता था कि नीरजा की तकरार करने की आदत केवल उसकी स्वभावगत कमजोरी नहीं, बल्कि एक ज़हरीली प्रवृत्ति है। वह दूसरों की भावनाओं का सम्मान कम करती, लेकिन खुद हर बात में सही होने का दावा करती।
बच्चों के साथ भी यही रवैया था। अगर बच्चे घर में कोई गलती करते, तो नीरजा बिना वजह गुस्सा करती और कभी-कभी उन्हें डराकर अपनी बात मनवाती। राहुल कई बार कोशिश करता कि बच्चों को समझाए कि गलती करना सीखने का हिस्सा है, पर नीरजा उसे रोक देती।
“तुम बच्चे को बहुत नरम बना रहे हो। आज नहीं संभाला, तो कल पछताओगे,” वह कहती।
राहुल ने कई बार खुद को संभालने की कोशिश की। उसने सोचा,
“हर व्यक्ति अपने तरीके से जीता है, लेकिन यह रवैया परिवार को जहर बना रहा है। मेरी जिम्मेदारी है कि मैं घर का संतुलन बनाऊँ।”
एक दिन नीरजा ने राहुल पर आरोप लगाया कि वह बच्चों के साथ समय नहीं बिताता। राहुल चुपचाप मुस्कराया और बोला,
“नीरजा, बच्चों को हमारा प्यार और मार्गदर्शन चाहिए। तकरार से उनका मन दुखी होता है। अगर हम शांत और समझदारी से काम लें, तो घर में हर कोई खुश रहेगा।”
नीरजा ने तिरछी नजरों से देखा और चुप हो गई। यह पहली बार था जब उसने महसूस किया कि उसके गुस्से और आरोपों का असर केवल दूसरों पर नहीं, बल्कि उसके अपने परिवार पर भी पड़ रहा है।
राहुल ने धीरे-धीरे बदलाव लाने शुरू किया। वह नीरजा को टोकने या विरोध करने की बजाय प्रेम और धैर्य के साथ समझाने लगा। बच्चों को भी वह यह सिखाने लगा कि गलती करने में डर नहीं होना चाहिए।
धीरे-धीरे नीरजा को एहसास हुआ कि उसका हर आरोप और हर गुस्सा घर में विष फैला रहा है। उसने खुद से सवाल किया,
“क्या मैं सच में सभी की इज्जत कर रही हूँ, या सिर्फ अपने अहंकार को आगे बढ़ा रही हूँ?”
समय के साथ नीरजा ने अपनी आदतें बदलनी शुरू की। वह छोटे-छोटे मामलों में चुप रहने लगी, बच्चों के साथ प्यार और समझदारी दिखाने लगी। राहुल ने उसका साथ दिया, उसे समझाया, और घर के वातावरण को धीरे-धीरे शांत बनाया।
कुछ सालों में घर का माहौल बदल गया। नीरजा अब अपने गुस्से और आरोपों पर काबू पा चुकी थी। बच्चों ने भी अपने माता-पिता के बीच शांति महसूस की। राहुल ने जाना कि ज़हरीला स्वभाव कभी पूरी तरह मिटता नहीं, लेकिन धैर्य, समझदारी और प्रेम से इसे बदलना संभव है।
और इस तरह, राहुल और नीरजा ने सीखा कि परिवार में संतुलन बनाए रखना केवल नियम या आदेश से नहीं, बल्कि समझदारी, धैर्य और प्रेम से संभव है।