लघु कथा-5

देवेश्वर अक्सर शाम को छत पर बैठकर डूबते सूरज को देखता था। उस समय उसके मन में अजीब से सवाल उठते—ज़िंदगी हमें कहाँ से कहाँ ले आई। बचपन की गलियाँ, मिट्टी की महक, और नंगे पाँव भागने की आज़ादी जैसे कहीं पीछे छूट गई थी।
उसे याद था, जब किताबों पर जिल्द चढ़ाना और उन्हें नए थैले में रखना किसी त्यौहार से कम नहीं लगता था। नई कॉपियाँ, नई स्लेट, और स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर “कैल्शियम” पूरी करने की शरारत—वो दिन कितने सच्चे थे। पढ़ाई का तनाव कम करने के लिए पेंसिल का पिछला हिस्सा चबाना, किताब के बीच मोरपंख रखना, और फिर भी पिट जाना—ये सब जैसे ज़िंदगी का हिस्सा था।
देवेश्वर को अपने दोस्त भी याद आते। एक दोस्त साइकिल के डंडे पर बैठता, दूसरा कैरियर पर, और तीनों बिना डरे सड़कों पर निकल पड़ते। न हेलमेट, न नियम, बस दोस्ती और हँसी। स्कूल में मुर्गा बनना भी कोई बड़ी बात नहीं थी। पिटने वाला खुश कि आज कम पिटा, और पीटने वाला खुश कि हाथ साफ हो गया। ईगो नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं।
माता-पिता को भी ज्यादा फ़िक्र नहीं रहती थी। सालों तक उनके कदम स्कूल में नहीं पड़े। उन्हें बस इतना पता होता था कि बच्चा पढ़ने जाता है, बस। हम किस कक्षा में हैं, ये पूछने का वक़्त भी किसके पास था। लेकिन प्यार इतना था कि कभी महसूस ही नहीं हुआ कि कुछ कम है।
देवेश्वर को यह भी याद आया कि वह कभी अपने माँ-बाप से “आई लव यू” नहीं कह पाया। उसे ये शब्द ही नहीं आते थे। पर जब माँ बीमार होती, वह चुपचाप उनके पास बैठ जाता। जब पिता थके होते, उनका थैला खुद उठा लेता। प्यार बोलकर नहीं, करके दिखाया जाता था।
फिर ज़माना बदला। दादाजी गुनगुनाते थे—“मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राज दुलारा।” देवेश्वर ने गाया—“पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा।” और अब उसके बच्चे गाते हैं—“बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है।” गाने बदले, सोच बदली, ज़िंदगी की चाल बदल गई।
आज देवेश्वर के पास मोबाइल है, कार है, आराम है—पर वो मिट्टी की महक नहीं है। बच्चों को अब साइकिल के डंडे पर बैठने नहीं दिया जाता। अब तो भटूरे में ईनो डालकर उसे फुलाया जाता है, और वही भटूरा पेट फुला दे तो ईनो पीकर पेट पिचकाया जाता है।
देवेश्वर हँसते हुए सोचता है—हम सच में कहाँ से कहाँ आ गए। पहले भूख लगती थी तो रोटी अच्छी लगती थी, आज सब कुछ है पर स्वाद कम है। पहले दोस्त थे, आज कॉन्टैक्ट लिस्ट है। पहले माँ-बाप के लिए कुछ कर जाते थे, आज उनके लिए “टाइम निकालना” पड़ता है।
छत से नीचे उतरते हुए उसने तय किया कि वह अपने बच्चों को ये कहानियाँ ज़रूर सुनाएगा—ताकि उन्हें पता चले कि ज़िंदगी सिर्फ़ स्क्रीन और आराम का नाम नहीं है, बल्कि मिट्टी, दोस्ती और सादगी का भी नाम है। क्योंकि अगर हम पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे, तो आगे की राह भी शायद खो जाएगी।

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Rajeev Verma

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