लघु कथा – 49

प्रमोद और अल्करानी की शादी को दस साल हो चुके थे। बाहर से देखने पर उनकी ज़िंदगी ठीक लगती थी—सुंदर घर, अच्छे कपड़े, दो प्यारे बच्चे। लेकिन भीतर का दृश्य बिल्कुल अलग था।
अल्करानी रोज़ सुबह उठकर भगवान की पूजा करती, मंत्र पढ़ती और ध्यान में बैठती। वह तीन-तीन बार विधिवत प्रार्थना करती। हर कोई सोचता कि वह बहुत धर्मात्मा है। पर घर में, वही पूजा करने वाली औरत बच्चों पर छोटे-मोटे कारणों से चिल्लाती, कभी हाथ उठाकर मारती। पति प्रमोद के लिए तो हर दिन एक नई चुनौती था।
“अल्करानी, थोड़ी शांति तो रखो,” प्रमोद अक्सर कहता, पर उसका जवाब हमेशा तीखा होता—“तुम मुझसे क्या समझते हो, तुम खुद देखो तो सही!”
बच्चे डर के मारे धीरे-धीरे अपने कमरे में बैठ जाते। घर में प्रेम और समझ का वातावरण नहीं था। अल्करानी की ध्यान मुद्रा और मंत्र बोलना, घर की अशांति को दबा नहीं पा रही थी।
एक दिन प्रमोद ने देखा कि अल्करानी फिर से पूजा कर रही है, मंत्र पढ़ रही है, लेकिन आँखों में क्रोध और चिंता साफ़ झलक रही थी। उसने धीरे से कहा,
“अल्करानी, पूजा और ध्यान करना अच्छा है, पर क्या यह तुम्हारे मन को शांत कर रहा है? बच्चों और मेरे लिए यह क्रोध और मार क्यों?”
अल्करानी रुकी, मंत्र का उच्चारण बीच में ही ठहर गया। उसने कहा,
“प्रमोद, मैं धर्म का पालन करती हूँ। मैं भगवान की सेवा कर रही हूँ। मुझे घर का काम और बच्चों की डांट नहीं रोकती।”
प्रमोद ने प्यार से समझाया,
“धर्म केवल मंत्र और पूजा नहीं है। धर्म का अर्थ है शांति, मौन, शून्यता। अगर तुम्हारा मन शांत नहीं है, तो यह पूजा केवल एक क्रिया बनकर रह जाती है। धर्म वह है जो हृदय को कोमल बनाए, चेतना को विस्तृत करे। बच्चों को मारकर और मुझसे लड़कर तुम किस धर्म की सेवा कर रही हो?”
अल्करानी की आँखों में आँसू आ गए। वह लंबे समय से खुद भी यह महसूस कर रही थी, लेकिन शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रही थी। उसने सोचा,
“मैं तो दिन में तीन बार भगवान को देखती हूँ, पर खुद का क्रोध और चिंता नहीं देखती।”
उस दिन उसने पहली बार ध्यान करते समय केवल मंत्रों पर नहीं, बल्कि अपने भीतर की अशांति पर ध्यान दिया। उसने महसूस किया कि उसका क्रोध, ईर्ष्या और असंतोष ही उसके धर्म और घर दोनों को नुकसान पहुँचा रहे थे।
धीरे-धीरे अल्करानी ने बच्चों के साथ धैर्य रखना शुरू किया। पहले जो हर छोटी बात पर मार देती थी, अब वह सिर्फ समझाने लगी। प्रमोद की मदद से उसने अपने ध्यान और प्रार्थना को केवल क्रिया से आगे बढ़ाकर आंतरिक शांति बनाने का साधन बनाया।
कुछ महीनों में घर का माहौल बदल गया। बच्चे डर के बजाय प्रेम महसूस करने लगे। प्रमोद ने देखा कि अल्करानी का चेहरा अब केवल क्रोध और चिंता नहीं, बल्कि शांति और कोमलता भी दर्शाता है।
अल्करानी समझ गई—धर्म केवल पूजा और मंत्र नहीं है। धर्म वही है जो भीतर की अशांति को गलाकर जीवन को प्रेम और शांति से भर दे। अब उसका घर भी धर्ममय बन गया, क्योंकि उसने समझ लिया कि सच्चा धर्म दूसरों और अपने मन की शांति में है।
और इस तरह, अल्करानी ने सीखा कि असली पूजा सिर्फ मंदिर या मंत्र में नहीं, अपने जीवन और परिवार में शांति और प्रेम लाने में है।

Published by

Unknown's avatar

Rajeev Verma

Thanks For watching. Note:- ALL THE IMAGES/PICTURES SHOWN IN THE VIDEO BELONGS TO ME. I AM THE OWNER OF ANY PICTURES SHOWED IN THE VIDEO ! DISCLAIMER: This Channel DOES NOT Promote or encourage Any illegal activities , neither any services of any child is taken in this video making, all contents provided by this Channel is meant for Sharing Knowledge and awareness for health only . Rajeev Verma #HealthyFeasting. I Loves to post videos on Preventive Health Maintenance Food Recipes. Subscribe my YouTube Channel NOW. http://www.youtube.com/c/HealthyFeasting

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.