लघु कथा – 48

आशा एक छोटी-सी कॉलोनी में रहती थी। वह हमेशा दूसरों की मदद करने में विश्वास रखती थी। किसी की तकलीफ़ देखती, तो उसे कमज़ोरी या बहाना नहीं समझती—बल्कि दिल खोलकर सहानुभूति देती।
पवन, उसका पड़ोसी, हमेशा व्यस्त और व्यस्त रहने का दिखावा करने वाला आदमी था। उसे लगता था कि ज़िंदगी में केवल अपने लिए जीना चाहिए। दूसरों के दुख को देखकर वह अक्सर सोचता,
“जो हुआ, वह उसकी खुद की गलती है। यही जीवन का नियम है।”
एक दिन आशा ने देखा कि कॉलोनी के एक बुज़ुर्ग घर में अकेले रहते हैं और बीमार हैं। वह तुरंत उनके लिए दवा और खाना ले गई। पवन ने देखा और टोका,
“आशा, इतनी मेहनत क्यों? ये लोग तो हमेशा परेशान रहते हैं। शायद उनके कर्मों की सज़ा है।”
आशा ने चुपचाप मुस्कराया और अपने काम में लगी रही। पवन ने सोचा, “इस दौर में लोग कितने भावुक हैं, पर ये भावुकता बेकार होती है।”
कुछ महीने बाद आशा और पवन की ज़िंदगी में भी कठिन समय आया। पवन की नौकरी अचानक चली गई, और परिवारिक परेशानियाँ बढ़ गईं। उसकी सोच में बदलाव आने लगा—जो दूसरों के दुख को कर्म की सज़ा मानता था, अब वही उसके जीवन में आया।
आशा ने देखा कि पवन उदास और तनाव में है। उसने पवन से कहा,
“पवन, ज़िंदगी कभी आसान नहीं होती। दुख सबको आता है, और इसे ईश्वरीय परीक्षा कहना आसान है, लेकिन असली मदद वही है जो दर्द को समझकर दिया जाए।”
पवन चुप रहा। उसने महसूस किया कि वह हमेशा दूसरों के दुःख का न्याय करता था, लेकिन जब खुद पर विपत्ति आई, तो उसे सांत्वना की तलाश थी। आशा ने उसे धीरे से समझाया,
“दुख किसी की गलती नहीं, किसी का कर्म नहीं है। यह तो ज़िंदगी का हिस्सा है। और दूसरों के दुख में संवेदनशीलता वही दिखाती है जो इंसानियत कहलाई जाती है।”
पवन ने पहली बार महसूस किया कि उसका दृष्टिकोण कितना संकुचित और स्वार्थी था। उसने कहा,
“मैं हमेशा सोचता था कि दूसरों के दुख उनकी गलती है। पर अब जब वही मेरे जीवन में आया है, तो मुझे समझ में आया कि असली ताकत दूसरों के लिए महसूस करने और मदद करने में है।”
आशा मुस्कुराई। उसने पवन को अपने साथ कॉलोनी के बुज़ुर्ग के पास ले जाकर दिखाया कि कैसे छोटे-छोटे कार्य किसी की जिंदगी में आशा की रोशनी जगा सकते हैं।
पवन ने धीरे-धीरे बदलना शुरू किया। वह अब दूसरों के दुख को देखकर सवाल नहीं करता, बल्कि सोचता,
“मैं उनकी मदद कैसे कर सकता हूँ?”
समय के साथ पवन और आशा दोनों ने महसूस किया कि संवेदनाएँ ही इंसानियत की सबसे बड़ी ताकत हैं। दुख किसी की सज़ा नहीं, और मदद ही वास्तविक सफलता है।
कॉलोनी में लोग आशा की भावुकता और पवन के परिवर्तन को देखकर कहते,
“यह दौर कठिन है, पर इंसानियत अभी भी जीवित है।”
आशा और पवन बस मुस्कराते—क्योंकि उन्होंने जाना कि कलयुग हो या कोई भी समय, संवेदनशीलता और मदद की भावना इंसान को महान बनाती है।

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Rajeev Verma

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