लघु कथा – 47

सरिता बहुत जल्दी किसी से जुड़ जाती थी। उसे लगता था कि रिश्ते ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। बचपन से उसने माँ को सबके लिए जीते देखा था, इसलिए उसने भी यही सीखा—देना, समझना, निभाना। उसके लिए रिश्ता मतलब था पूरा समर्पण।
शादी के बाद उसने अपने पति में दोस्त खोजा। वह हर छोटी-बड़ी बात उससे साझा करती। शुरू में सब बहुत अच्छा था। पति उसकी बातें ध्यान से सुनता, उसकी भावनाओं को समझता। सरिता को लगा कि यही सच्चा रिश्ता है—जहाँ बिना कहे सब समझ लिया जाए।
फिर उसने कुछ दोस्तों से भी गहरा रिश्ता बनाया। वे साथ हँसते, रोते, सपने देखते। सरिता सबके लिए हमेशा मौजूद रहती—रात को फोन आए तो उठती, कोई बीमार हो तो दौड़ती, कोई दुखी हो तो अपनी तकलीफ भूल जाती।
धीरे-धीरे उसके भीतर एक नई चीज़ जन्म लेने लगी—उम्मीद।
उम्मीद कि जैसे वह देती है, वैसे ही उसे भी मिलेगा।
उम्मीद कि लोग कभी नहीं बदलेंगे।
उम्मीद कि कोई उसे कभी नज़रअंदाज़ नहीं करेगा।
लेकिन समय के साथ सब बदलने लगा। पति काम में ज्यादा व्यस्त रहने लगा। बातें कम हो गईं। दोस्त अपनी-अपनी ज़िंदगी में उलझ गए। पहले जो लोग बिना कहे समझ लेते थे, अब कभी-कभी उसकी बात सुनना भी भूल जाते।
सरिता के मन में सवाल उठने लगे—
“क्या मैं ज़्यादा चाह रही हूँ?”
“क्या मैं किसी पर बोझ बन गई हूँ?”
वह हर रात खुद को दोष देती।
“शायद मुझमें ही कमी है।”
“शायद मैं ही ज़्यादा भावुक हूँ।”
वह रिश्तों को बचाने के लिए और ज़्यादा देने लगी, और ज़्यादा समझने लगी। लेकिन जितना वह देती, उतना ही भीतर से खाली होती जाती।
एक दिन वह अपनी पुरानी डायरी खोलकर बैठी। उसमें सालों पहले लिखा था—
“रिश्ते बिना शर्त सुंदर होते हैं।”
उसने वह लाइन बार-बार पढ़ी। उसे पहली बार समझ आया कि कहीं न कहीं उसने खुद ही शर्तें जोड़ ली थीं—
कि सामने वाला हमेशा वैसा ही रहेगा,
कि वह वैसा ही करेगा जैसा वह चाहती है,
कि वह उतना ही लौटाएगा जितना वह देती है।
उसने खुद से पूछा—
“क्या मैंने लोगों को उनके जैसे रहने दिया?
या मैं उन्हें अपनी उम्मीदों के साँचे में ढालना चाहती रही?”
उसे समझ आया कि दर्द लोगों से नहीं आया, दर्द उसकी उम्मीदों से आया।
उस दिन उसने एक छोटा-सा फैसला किया—
वह रिश्ते निभाएगी, पर उन्हें बाँधकर नहीं रखेगी।
वह देगी, पर बदले में हिसाब नहीं रखेगी।
वह चाहेगी, पर किसी को अपने तरीके से चलने पर मजबूर नहीं करेगी।
अब वह पति से बात करती थी, पर यह उम्मीद नहीं रखती थी कि वह हर बार उसकी भावनाओं को वैसे ही समझे।
दोस्तों से मिलती थी, पर यह शिकायत नहीं करती थी कि वे पहले जैसे क्यों नहीं हैं।
वह अब रिश्तों को पकड़ने की जगह, उन्हें बहने देने लगी।
धीरे-धीरे उसके भीतर का बोझ हल्का होने लगा। वह अब कम दुखी होती थी, क्योंकि अब वह कम माँगती थी। वह जान गई थी कि हर इंसान अपनी सीमाओं के साथ आता है।
एक दिन किसी ने उससे पूछा,
“अब रिश्ते कैसे लगते हैं?”
सरिता मुस्कराई और बोली,
“अब रिश्ते बोझ नहीं, अनुभव हैं।
कोई जितना दे सकता है, उतना ही उसका सच है।
उससे ज़्यादा चाहना अब मैं अपनी गलती मानती हूँ।”
वह समझ चुकी थी—
रिश्ते दर्द नहीं देते,
दर्द हमारी उम्मीदें देती हैं।
और जब उम्मीद हल्की हो जाती है,
तो रिश्ता फिर से हल्का और सुंदर हो जाता है।

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Rajeev Verma

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