लघु कथा – 46

रमन एक शांत स्वभाव का युवक था। बाहर से देखने पर उसकी ज़िंदगी ठीक लगती थी—नौकरी, घर, दोस्त। लेकिन भीतर उसका मन बहुत संवेदनशील था। छोटी-छोटी बातें उसे गहराई तक छू जातीं। कभी किसी की बेरुख़ी, कभी किसी अपने की दूरी—सब उसके भीतर जमा होता जाता।
एक साल में बहुत कुछ बदल गया। माँ की बीमारी, नौकरी में अनिश्चितता और एक टूटता हुआ रिश्ता—इन सबने रमन को थका दिया। वह लोगों के बीच रहता, पर भीतर अकेला महसूस करता। रात को जब सब सो जाते, वह छत पर बैठकर आसमान देखता और सोचता,
“कभी-कभी लगता है… सब यहीं खत्म हो जाए तो शायद शांति मिल जाए।”
यह विचार उसे डराता भी था, और खींचता भी। वह समझ नहीं पाता कि यह थकान है, दुख है, या मन का कोई और ही कोना बोल रहा है।
एक दिन ऑफिस में उसकी पुरानी सहकर्मी ने कहा,
“रमन, तुम अब पहले जैसे नहीं लगते। आँखों में कुछ बुझा-बुझा है।”
रमन चुप रहा, पर वह बात उसके भीतर गूँजती रही।
शाम को वह अपने बचपन के पार्क में चला गया। वही झूला, वही पेड़। वहाँ एक बूढ़े माली ने उसे देखा और पूछा,
“बेटा, उदास क्यों हो?”
रमन बोला,
“बस… मन भारी है।”
माली ने कहा,
“मन मौसम जैसा होता है। कभी धूप, कभी बारिश। पर बारिश का मतलब ये नहीं कि सूरज मर गया।”
यह बात रमन के दिल में उतर गई।
उस रात उसने पहली बार अपने मन से लड़ने की जगह, उसे सुना। उसने खुद से कहा,
“तू मरना नहीं चाहता… तू बस दर्द से भागना चाहता है।”
उसे समझ आया कि मौत का ख्याल असल में अंत की चाह नहीं, बल्कि पीड़ा से छुटकारे की तलाश है।
अगले दिन उसने एक दोस्त को सब बता दिया—डर, अकेलापन, थकान। दोस्त ने कहा,
“तू अकेला नहीं है। चल, किसी से बात करते हैं जो समझता हो।”
रमन ने काउंसलर से बात शुरू की। वहाँ उसे पता चला कि दुख और टूटन में ऐसा सोचना कमजोरी नहीं, इंसानी मन की प्रतिक्रिया है। फर्क बस इतना है—कुछ लोग उस मोड़ पर रुक जाते हैं, और कुछ लोग मदद लेकर आगे बढ़ जाते हैं।
धीरे-धीरे रमन ने छोटे-छोटे कदम उठाए—
सुबह टहलना,
मन की बातें लिखना,
पुरानी पसंदीदा किताबें पढ़ना,
और सबसे ज़रूरी—ज़रूरत पड़ने पर बोल देना।
एक दिन वह फिर उसी छत पर बैठा था, पर अब आसमान देखकर यह नहीं सोच रहा था कि “सब खत्म हो जाए।”
वह सोच रहा था,
“अभी दर्द है, पर ये पूरा सच नहीं है। आगे कुछ और भी हो सकता है।”
उसने मन ही मन कहा,
“मेरे भीतर का मन बहुत गहरा है। जब वह अंधेरे में जाता है, तो मुझे उसे हाथ पकड़कर वापस लाना है—मदद से, प्यार से, धैर्य से।”
रमन अब भी कभी-कभी उदास होता है। पर अब वह जानता है—
जब मन अंत की बात करे,
तो असल में वह सुनना चाहता है:
“तू अकेला नहीं है।
और यह दौर भी

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Rajeev Verma

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