सुमन की शादी को छह महीने हो चुके थे। ससुराल बड़ा था, लोग अच्छे थे, पर फिर भी उसके दिल में एक कोना हमेशा खाली रहता। वह अपने मायके को बहुत याद करती—माँ की डाँट, पिता की चुपचाप मुस्कान, वही पुराना आँगन, वही नीम का पेड़।
लेकिन वह वहाँ जाने से हिचकती थी।
उसे लगता, “अब मैं पराई हो गई हूँ। बार-बार मायके जाना अच्छा नहीं लगता। लोग क्या कहेंगे?”
कई बार माँ फोन पर कहती, “बेटी, आ जा कुछ दिन।”
सुमन टाल देती, “अभी काम है अम्मा, फिर आऊँगी।”
उसके मन में एक अजीब-सा डर था—जैसे मायके जाना कोई गलती हो।
एक दिन राघोराम, उसके ससुर, ने उसे उदास बैठे देखा। वे बहुत शांत स्वभाव के थे, कम बोलते थे लेकिन जब बोलते, तो दिल तक बात पहुँचती।
उन्होंने पूछा,
“बहू, आजकल चुप-सी क्यों रहती हो?”
सुमन बोली,
“कुछ नहीं बाबूजी… बस ऐसे ही।”
राघोराम मुस्कराए।
“ऐसे ही कभी नहीं होता। कुछ तो है।”
थोड़ी देर चुप रहने के बाद सुमन ने कहा,
“बाबूजी, मन तो बहुत करता है मायके जाने का… पर लगता है अब वो मेरा घर नहीं रहा। शादी के बाद लड़की तो… पराई हो जाती है न?”
राघोराम ने गहरी साँस ली। बोले,
“बेटी, घर ईंट-पत्थर से नहीं बनता, यादों से बनता है। और यादों पर किसी की शादी की मुहर नहीं लगती।”
सुमन ने उनकी ओर देखा।
राघोराम बोले,
“तुम्हें वहाँ जाने के लिए न बुलावा चाहिए, न इजाज़त।
तुम जैसे भी हो—थकी, खुश, रोती, हँसती—वो दरवाज़ा तुम्हारे लिए हमेशा खुला है।
वहाँ की हवा में तुम्हारे बचपन की खुशबू है, जो तुम्हें फिर से सुरक्षित महसूस कराती है।”
सुमन की आँखें भर आईं।
राघोराम ने कहा,
“अगर तुम अपने मायके नहीं जाओगी, तो भीतर-ही-भीतर सूख जाओगी। और सूखी बहू किसी घर को हरा-भरा नहीं कर सकती।”
सुमन बोली,
“लेकिन लोग बातें करेंगे…”
राघोराम मुस्कराए,
“लोग तो तब भी करेंगे जब तुम जाओगी, तब भी जब नहीं जाओगी।
पर तुम्हारा दिल कब जिएगा—ये सिर्फ तुम्हें तय करना है।”
उस रात सुमन ने माँ को फोन किया।
“अम्मा… मैं आऊँ?”
माँ की आवाज़ काँप गई,
“बेटी, पूछ क्या रही है… तेरा घर है वो।”
दो दिन बाद सुमन मायके पहुँची। वही दरवाज़ा, वही खुशबू, वही आँगन। माँ ने उसे वैसे ही गले लगाया जैसे बचपन में लगाती थी—बिना सवाल, बिना शर्त।
सुमन को लगा जैसे उसके भीतर का तूफान शांत हो गया हो।
लौटते समय उसने राघोराम के पैर छुए।
बोली,
“बाबूजी, आपने मुझे मेरा घर लौटा दिया।”
राघोराम ने कहा,
“नहीं बेटी… मैंने बस तुम्हें याद दिलाया कि कुछ दरवाज़े कभी बंद नहीं होते—
खासतौर पर वो, जिन पर बचपन की दस्तक होती है।”