लघु कथा – 43

कमला एक छोटे से शहर में रहती थी। बाहर से देखने पर उसकी ज़िंदगी साधारण थी—घर, बाज़ार, रिश्तेदार, रोज़मर्रा की भागदौड़। लेकिन भीतर, उसके मन में हमेशा शोर रहता था—डर का, तुलना का, शिकायतों का।
वह अक्सर सोचती, “सब लोग मेरे खिलाफ क्यों हैं?”
कभी उसे लगता पड़ोसी ईर्ष्या करते हैं, कभी रिश्तेदार उसकी कमज़ोरी ढूँढते हैं, कभी दुनिया ही उसे गलत लगती।
एक दिन वह बहुत थकी हुई थी। मन में गुस्सा, आँखों में आँसू। वह पास के पुराने मंदिर के पीछे बने बगीचे में जा बैठी। वहाँ एक बूढ़ा बाँसुरी बजा रहा था। धुन इतनी शांत थी कि कमला का रोना अपने आप रुक गया।
बूढ़े ने मुस्करा कर कहा,
“बहन, लगता है तुम्हारे भीतर बहुत शोर है।”
कमला चौंक गई। बोली,
“शोर तो दुनिया करती है। लोग दुख देते हैं।”
बूढ़ा बोला,
“दुनिया बस आवाज़ देती है। शोर तुम खुद बनाती हो।”
यह बात कमला को अजीब लगी।
“मतलब?” उसने पूछा।
बूढ़ा बोला,
“अगर भीतर संगीत हो, तो बाहर का शोर भी ताल बन जाता है। और अगर भीतर शोर हो, तो मीठी बात भी चुभती है।”
कमला चुप हो गई।
उस रात वह सो नहीं पाई। उसने पहली बार खुद से पूछा—
“क्या सच में मेरा दुश्मन बाहर है, या भीतर?”
अगले दिन उसने एक छोटा प्रयोग किया। जब किसी ने उसे ताना मारा, तो उसने जवाब देने की जगह गहरी साँस ली।
जब मन ने कहा, “तू बेकार है,” उसने कहा, “नहीं, तू सीख रही है।”
जब ईर्ष्या उठी, उसने कहा, “उसके पास है, मेरे पास कुछ और होगा।”
धीरे-धीरे उसने देखा—दुश्मन सच में बाहर नहीं था।
वह भीतर था—डर, हीनता, गुस्सा, तुलना के रूप में।
एक शाम वह फिर उसी बगीचे में गई। बूढ़ा फिर बाँसुरी बजा रहा था।
उसने कहा,
“मैंने अपने भीतर एक दोस्त पाया है।”
बूढ़ा हँसा,
“और वह क्या करता है?”
कमला बोली,
“वह मुझे गिरने से पहले संभालता है।
वह मुझे कहता है—तू जैसी है, ठीक है।
वह मुझे सिखाता है कि शोर से नहीं, संगीत से जीना है।”
अब कमला की ज़िंदगी बाहर से बहुत नहीं बदली थी—वही घर, वही लोग, वही शहर।
पर भीतर सब बदल गया था।
अब जब कोई कटु बोलता, तो वह मन में कहती—
“यह उसकी आवाज़ है, मेरा संगीत नहीं।”
अब जब कोई तारीफ करता, तो वह फूलकर नहीं बहकती—बस मुस्करा देती।
धीरे-धीरे लोगों ने कहा,
“कमला अब अलग लगती है… शांत… सधी हुई।”
कमला जानती थी—
वह बदली नहीं, जागी है।
एक दिन उसने अपनी बेटी से कहा,
“बाहर मत ढूँढ दुश्मन और दोस्त।
दोनों तेरे भीतर हैं।
जिसे तू खाना देगी, वही बड़ा होगा।”
उस रात कमला खिड़की के पास बैठी थी। हवा चल रही थी।
उसे लगा जैसे भीतर कोई बाँसुरी बज रही हो—
डर की जगह धैर्य,
शिकायत की जगह स्वीकार,
और शोर की जगह संगीत।
वह मुस्कराई और बोली—
“अब मैं अस्तित्व से तालमेल में हूँ।”

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Rajeev Verma

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