लघु कथा – 42

सोनू पचास की उम्र पार कर चुकी थी। लोग उसे देखकर कहते, “अब तो आराम की उम्र है।”
लेकिन सोनू के भीतर कुछ और ही चल रहा था—एक खालीपन, एक प्यास, जिसे वह शब्दों में ठीक से समझा भी नहीं पाती थी।
उसकी शादी बीस साल चली थी, पर वह शादी कभी रिश्ते जैसी नहीं रही। पति जिम्मेदार था, पर भावनात्मक रूप से दूर। न तारीफ, न स्पर्श में अपनापन, न यह एहसास कि वह किसी की चाह है। बच्चों की परवरिश और घर की जिम्मेदारियों में सोनू ने खुद को भुला दिया।
पचास के बाद जब बच्चे अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए और पति भी दुनिया छोड़ गया, तब सोनू पहली बार सच में अकेली हुई।
अब उसके पास समय था—खुद के लिए।
और इसी समय उसे एहसास हुआ कि उसने कभी अपने दिल की सुनी ही नहीं।
एक दिन उसकी एक सहेली ने कहा,
“तू अब भी खूबसूरत है, सोनू। तू क्यों खुद को खत्म मान लेती है?”
यह बात सोनू के मन में घर कर गई। उसने आईने में खुद को देखा—झुर्रियाँ थीं, पर आँखों में अभी भी चमक थी। उसने सोचा,
“क्या चाह खत्म होने की कोई उम्र होती है?”
सोनू को सिर्फ शरीर की नहीं, सम्मान की भूख थी। वह चाहती थी कि कोई उसे सिर्फ “माँ” या “विधवा” नहीं, बल्कि एक औरत की तरह देखे—जिसे चाहा जा सके, जिसके पास कोई आना चाहे।
धीरे-धीरे उसने नए लोगों से मिलना शुरू किया। कुछ रिश्ते भावनात्मक थे, कुछ सिर्फ साथ चलने तक सीमित। वह किसी बंधन में नहीं बंधना चाहती थी। उसने खुद से कहा,
“अब मैं किसी के लिए नहीं, अपने लिए जीऊँगी।”
लोग बातें करने लगे—
“इस उम्र में यह सब?”
“शर्म नहीं आती?”
पर सोनू जानती थी कि उसने आधी जिंदगी दूसरों की खुशी में लगा दी थी। अब वह अपनी खुशी चाहती थी—बिना डर, बिना मजबूरी।
उसके लिए यह “असीम आज़ादी” सिर्फ शरीर की बात नहीं थी। यह उस अधिकार की बात थी जो उसने कभी लिया ही नहीं था—अपनी चाह को मानने का अधिकार, अपनी ज़रूरत को सही ठहराने का अधिकार।
वह कहती,
“मैं किसी को धोखा नहीं देती, किसी को मजबूर नहीं करती। जो भी रिश्ता है, साफ है, सहमति से है, इज़्ज़त के साथ है।”
कुछ रिश्ते टिके, कुछ टूट गए। हर अनुभव ने उसे थोड़ा और समझदार बनाया। उसे पता चला कि सिर्फ आकर्षण काफी नहीं होता—सम्मान, संवाद और सच्चाई ज़रूरी होते हैं।
एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा:
“मैं वासना की गुलाम नहीं हूँ। मैं उस औरत की खोज में हूँ, जो कभी बनने नहीं दी गई। अगर इस राह में मुझे प्यार, स्पर्श और साथ मिलता है, तो यह पाप नहीं—यह मेरी ज़िंदगी है।”
सोनू अब किसी से सफाई नहीं देती थी। वह जानती थी—
हर इंसान को चाहने का हक है।
उम्र शरीर की होती है, दिल की नहीं।

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Rajeev Verma

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