लघु कथा – 41

आनंद एक आधुनिक शहर में रहने वाला कॉलेज का छात्र था। उसके पास सब कुछ था—मोबाइल, लैपटॉप, इंटरनेट, गेम्स, सोशल मीडिया। लेकिन उसके पास जो नहीं था, वह था—एकाग्रता। वह घंटों स्क्रीन देखता, पर पाँच मिनट भी किसी किताब या अपने विचारों के साथ नहीं बैठ पाता।
पढ़ाई में वह ठीक-ठाक था, पर मौलिक नहीं। न कोई नया विचार, न कोई गहरी समझ। उसके शिक्षक कहते, “आनंद, तुम होशियार हो, पर सोचते कम हो।” वह हँसकर टाल देता।
एक दिन उसके दादाजी गाँव से आए। उन्होंने आनंद को देर रात तक मोबाइल में डूबा देखा। बोले,
“बेटा, मशीन को याद है सब कुछ, पर तुझे क्या याद है?”
यह बात आनंद के दिल में चुभ गई।
अगले दिन कॉलेज में एक सेमिनार था—“बुद्धि की शक्ति।” वक्ता ने कहा,
“शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा—चारों की ताकत मिलकर इंसान बनता है। लेकिन अगर बुद्धि सोई रहे, तो आदमी मशीन बन जाता है।”
आनंद जैसे अपनी ही कहानी सुन रहा था।
उसने तय किया कि वह अपनी बुद्धि को जगाएगा। उसने सुबह फोन से दूर रहकर पढ़ना शुरू किया। पहले दस मिनट भी भारी लगते, पर धीरे-धीरे आदत बन गई। वह सिर्फ नोट्स नहीं पढ़ता, सवाल पूछता, सोचता, लिखता।
उसने संगीत सीखना शुरू किया। पहले सुर बिगड़ते, पर जब वह तन्मय होकर अभ्यास करता, तो उसे भीतर से खुशी मिलती। उसने महसूस किया कि एकाग्रता से ही सृजन होता है।
धीरे-धीरे वह अपने मन को भी समझने लगा। जब मन कहता, “आज मत पढ़, आराम कर,” तब उसकी बुद्धि कहती, “आराम अच्छा है, पर कर्तव्य छोड़ना ठीक नहीं।” अब वह हर बात मन से नहीं, विवेक से तय करने लगा।
एक दिन उसके दोस्त ने कहा,
“चल, परीक्षा में शॉर्टकट अपनाते हैं।”
मन ललचाया। पर बुद्धि बोली, “यह सुविधा नहीं, धोखा है।” आनंद ने मना कर दिया।
उस रात वह देर तक सोचता रहा—“मन चालाक है, पर बुद्धि सच्ची।”
अब वह सिर्फ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी अच्छा सोचने लगा। वह बच्चों को पढ़ाने लगा, उन्हें सोचने की आदत सिखाने लगा। वह कहता,
“रटना नहीं, समझना सीखो।”
एक दिन ध्यान करते हुए उसे अजीब शांति मिली। जैसे भीतर कोई उजाला जल उठा हो। उसने महसूस किया कि वह सिर्फ शरीर या दिमाग नहीं है—उसके भीतर कुछ शुद्ध, शांत और मजबूत है।
दादाजी ने कहा,
“बेटा, यही आत्मा है—जो न जन्म लेती है, न मरती है।”
अब आनंद का जीवन बदल चुका था। उसमें ताकत थी—शरीर की, मन की, बुद्धि की और आत्मा की। वह मशीन नहीं, इंसान बन चुका था।
वह जान गया था—
“असली शक्ति दिखावे में नहीं, भीतर की जागृति में है।”

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Rajeev Verma

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