लघु कथा – 40

सुनील एक साधारण कस्बे में रहने वाला युवक था। उसके पिता चाहते थे कि वह सिर्फ पढ़ाई में आगे बढ़े, माँ चाहती थीं कि वह संस्कारी बने, और दोस्त चाहते थे कि वह हमेशा मौज-मस्ती करे। सुनील इन तीनों के बीच उलझा रहता। उसे लगता, “क्या एक साथ सब कुछ बनना संभव है?”
कॉलेज में एक दिन उसके शिक्षक ने कहा,
“सच्चा विकास शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा—चारों का साथ-साथ बढ़ना है।”
यह बात सुनील के दिल में उतर गई।
उसने निश्चय किया कि वह खुद को हर दिशा में सुधारने की कोशिश करेगा। सुबह वह जल्दी उठकर दौड़ने जाने लगा। पहले पाँच मिनट में ही थक जाता, पर रोज़ कोशिश करता। कुछ महीनों में उसका शरीर मजबूत होने लगा। वह पहले से ज्यादा चुस्त और आत्मविश्वासी हो गया।
मन को शांत करने के लिए वह शाम को थोड़ी देर चुपचाप बैठने लगा। पहले उसका मन भटकता—कभी फोन, कभी दोस्तों की बातें याद आतीं। लेकिन धीरे-धीरे उसे अपने भीतर झाँकने की आदत पड़ गई। गुस्सा कम होने लगा, बेचैनी घटने लगी।
बुद्धि के विकास के लिए वह सिर्फ परीक्षा की किताबें नहीं पढ़ता था। वह जीवन, इतिहास, विज्ञान और अच्छे विचारों की किताबें पढ़ने लगा। बहस में वह अब चिल्लाता नहीं, तर्क से बात करता।
आत्मा के लिए वह किसी मंदिर या मस्जिद से ज्यादा इंसान की सेवा को धर्म मानने लगा। हर रविवार वह पास के वृद्धाश्रम जाता, बुज़ुर्गों से बातें करता, उनके लिए फल ले जाता। वहाँ उसे अजीब-सी शांति मिलती।
एक साल में लोग कहने लगे, “सुनील बदल गया है।”
वह पहले जल्दी हार मान लेता था, अब संघर्ष से डरता नहीं था। पहले वह सिर्फ अपने बारे में सोचता था, अब दूसरों की तकलीफ भी समझता था।
एक दिन कस्बे में बाढ़ आ गई। लोग घबरा गए। सुनील ने दोस्तों को इकट्ठा किया। किसी ने खाना बनाया, किसी ने दवाइयाँ जुटाईं, किसी ने बच्चों को सुरक्षित जगह पहुँचाया। सुनील सबको जोड़कर काम करवा रहा था—न चिल्लाकर, न दिखावा करके, बस शांत और मजबूत बनकर।
उस दिन लोगों ने देखा कि सुनील में सिर्फ ताकत नहीं थी, समझ भी थी; सिर्फ ज्ञान नहीं था, करुणा भी थी; सिर्फ भक्ति नहीं थी, कर्म भी था।
बूढ़े मास्टरजी ने कहा,
“यह लड़का नहीं, चलता-फिरता संतुलन है—शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का मेल।”
सुनील ने मन ही मन सोचा—
“पूर्णता कोई मंज़िल नहीं, रोज़ का संघर्ष है। पर यही संघर्ष हमें असली इंसान बनाता है।”
समय के साथ ऐसे कई युवक-युवतियाँ सुनील से प्रेरित होकर बदले। कस्बा पहले से ज्यादा साफ, शांत और सहयोगी हो गया।
लोग कहते,
“जब इंसान खुद बदलता है, तब समाज बदलता है। और जब बहुत से लोग खुद को संवारते हैं, तब देश अपने गौरव की ओर लौटता है।”
सुनील बस मुस्करा देता—क्योंकि वह जानता था, असली जीत दिखावे में नहीं, भीतर के परिवर्तन में होती है।

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Rajeev Verma

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