लघु कथा-4

देवेश्वर इस समय गहरी नींद में है। उसका छोटा सा हाथ उसके गाल के नीचे दबा हुआ है, जैसे वह अपने ही सपनों को थामे सो रहा हो। माथे पर पसीने की हल्की बूंदें चमक रही हैं और उन्हीं में उसके बालों की एक लट चिपक गई है। मैं दरवाज़े पर खड़ा उसे देख रहा हूँ, जैसे कोई अनमोल चीज़ आँखों से छूट न जाए, इस डर से उसे निहार रहा हूँ।
कुछ देर पहले मैं अख़बार पढ़ रहा था, पर शब्द धुंधले हो गए थे। मन भारी हो गया था। आज का दिन बार-बार आँखों के सामने घूम रहा था। और उसी अपराध-बोध ने मेरे कदम अपने आप देवेश्वर के कमरे तक खींच लाए।
आज मैंने उसे बहुत डांटा। सुबह जब वह स्कूल जाने को तैयार हो रहा था, उसका मुँह ठीक से साफ नहीं था, जूतों पर पालिश नहीं थी, और कमरा बिखरा पड़ा था। मैंने एक के बाद एक शब्दों के तीर चला दिए—“ये क्यों नहीं किया, वो क्यों नहीं किया?” नाश्ते की मेज़ पर भी मैं चैन से नहीं बैठा। “धीरे खाओ… चम्मच ठीक से पकड़ो… कोहनियाँ मत टिकाओ…” वह कुछ नहीं बोला। बस चुपचाप मेरी आँखों में देखता रहा, जैसे पूछ रहा हो—“पापा, मैं इतना बुरा हूँ क्या?”
स्कूल जाते समय उसने मुस्कराकर कहा था—“टा-टा पापा।”
पर मैंने उसकी मुस्कान नहीं देखी, बस उसके गंदे हाथ देखे। डांट दिया—“पहले हाथ धोकर आओ।”
उसकी मुस्कान वहीं कहीं गिर गई थी… शायद फर्श पर।
दोपहर को जब ऑफिस से लौटा, वह घुटनों के बल बैठकर गोलियाँ खेल रहा था। मोज़ों में छेद था। मैंने उसके दोस्तों के सामने ही उसे शर्मिंदा कर दिया। रात को खाने की मेज़ पर मैं उससे बात तक नहीं कर रहा था। वह बार-बार मेरी ओर देखता, जैसे मेरी चुप्पी में कोई जवाब ढूँढ रहा हो। पर मैं पत्थर बना रहा।
अब उसे सोते देख रहा हूँ। उसकी साँसें धीमी-धीमी चल रही हैं। उसकी पलकों के नीचे कोई सपना मुस्करा रहा होगा—शायद एक ऐसा सपना, जिसमें उसका पापा उससे नाराज़ नहीं है।
मुझे समझ आता है—उसके दिल का कुआँ अभी भी प्यार से भरा है। मेरी डांट, मेरी बेरुखी, मेरी चुप्पी—किसी ने भी उसके प्यार को सुखाया नहीं।
मैं उसके पास बैठ जाता हूँ। उसका छोटा सा हाथ अपने हाथ में लेता हूँ। वो नींद में भी जैसे मुझे पहचान गया हो, हल्का सा हिलता है, और उसके होंठों पर एक नन्ही सी मुस्कान आ जाती है।
और उस मुस्कान में मैं टूट जाता हूँ।
मन करता है उसे जगा दूँ, सीने से लगा लूँ और कहूँ—
“देवेश्वर, पापा गलत थे। बहुत गलत।”
पर वह अभी इतना छोटा है कि मेरे शब्दों का बोझ नहीं समझ पाएगा। फिर भी मैं फुसफुसाता हूँ—
“तुम बहुत बड़े हो, मेरे बेटे… अपने दिल से।”
आज मैं अपने आप से एक वादा करता हूँ।
अब मैं सिर्फ़ सुधारने वाला पिता नहीं बनूँगा, समझने वाला भी बनूँगा।
अब मैं उसकी गलतियों में उसे नहीं तोड़ूँगा, बल्कि उसे जोड़ूँगा।
अब मैं उसकी मुस्कान को देखूँगा, सिर्फ़ उसकी कमियाँ नहीं।
मैं धीरे से उठता हूँ, ताकि उसकी नींद न टूटे।
दरवाज़े पर मुड़कर उसे आख़िरी बार देखता हूँ और सोचता हूँ—
काश, वह कभी यह न कहे कि उसका बचपन मेरे शब्दों से डरता था।
मैं चाहता हूँ, वह यह कहे—
“मेरा पापा मेरी सबसे बड़ी ताक़त था।”

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Rajeev Verma

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