लघु कथा – 39

सुरेश एक सरकारी स्कूल में शिक्षक था। उसकी उम्र चालीस के करीब थी, पर मन बच्चों जैसा कोमल और समझदार था। उसे हमेशा लगता था कि बच्चे सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि इंसानों से सीखते हैं। इसलिए वह पहले खुद को ठीक रखने की कोशिश करता—समय पर आना, साफ बोलना, किसी से कठोरता से बात न करना।
उसके स्कूल में एक लड़का था—अमित। बहुत संवेदनशील। ज़रा-सी डाँट पर उसकी आँखें भर आतीं। दूसरे शिक्षक कहते, “यह लड़का कमजोर है, इसे सख्ती चाहिए।”
सुरेश चुप रहता। वह जानता था कि हर फूल को एक-सा पानी नहीं चाहिए।
एक दिन अमित बिना बताए स्कूल से गायब हो गया। सब घबरा गए। प्रधानाचार्य ने कहा, “उसके माता-पिता को बुलाओ, जरूर कोई गड़बड़ है।”
सुरेश ने कहा, “पहले सच जान लेते हैं।”
शाम को वह चुपचाप अमित के मोहल्ले गया। पता चला कि उसके पिता बीमार हैं और अमित अस्पताल में उनके साथ था। उसने किसी को बताया नहीं, क्योंकि डरता था कि सब डाँटेंगे।
अगले दिन सुरेश ने कक्षा में कुछ नहीं कहा। बस पढ़ाते-पढ़ाते बोला,
“गलती अज्ञान से होती है, जानबूझकर नहीं। गलती करने वाले को डर नहीं, समझ चाहिए।”
अमित की आँखें भर आईं। छुट्टी के बाद वह सुरेश के पास आया और सब सच बता दिया।
सुरेश ने उसके सिर पर हाथ रखा,
“बेटा, अगली बार बस बता देना। दोस्ती में डर नहीं होता।”
धीरे-धीरे बच्चे सुरेश को सिर्फ शिक्षक नहीं, दोस्त मानने लगे। वे अपने डर, अपनी गलतियाँ, सब उससे कह देते। सुरेश कभी किसी को सबके सामने अपमानित नहीं करता। वह अच्छाइयों को उभारता, गलतियों को प्यार से सुधारता।
एक बार स्कूल में झगड़ा हो गया। दो लड़के मारपीट पर उतर आए। बाकी शिक्षक सजा देने की सोच रहे थे। सुरेश ने दोनों को अलग कमरे में बुलाया, चाय पिलाई और पूछा,
“तुम दोनों में से कौन बुरा है?”
दोनों चुप।
सुरेश बोला,
“बुरा कोई नहीं होता, बस समझ कभी-कभी खो जाती है।”
बातों-बातों में सारा झगड़ा खुल गया और दोनों रो पड़े। सजा की जगह उन्हें समझ मिली।
साल के अंत में बच्चों ने एक छोटा कार्यक्रम रखा। अमित मंच पर आया और बोला,
“सुरेश सर ने हमें पढ़ाया नहीं, बनाया है। उन्होंने हमें डर से नहीं, भरोसे से बदला है।”
सुरेश की आँखें नम हो गईं। वह समझ गया कि दीपक खुद जले बिना रोशनी नहीं दे सकता। अगर शिक्षक का जीवन साफ हो, तो बच्चे अपने आप सीख जाते हैं।
उस दिन सुरेश ने मन ही मन कहा—
“बच्चों को सुधारने से पहले खुद को सुधारना पड़ता है। प्यार, धैर्य और विश्वास—यही सच्ची शिक्षा है।”

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Rajeev Verma

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