रामचंद्र एक छोटे कस्बे में रहता था। वह न तो बहुत पढ़ा-लिखा था, न ही किसी बड़े पद पर था, लेकिन उसमें एक बात खास थी—वह डर से नहीं, समझ से जीता था। लोग अक्सर अंधविश्वास में डूबे रहते। कोई कहता, “आज अमावस है, नया काम मत शुरू करो।” कोई कहता, “उस पेड़ के नीचे मत बैठो, वहाँ भूत रहता है।” रामचंद्र बस मुस्करा देता।
एक दिन कस्बे में खबर फैली कि पुराने कुएँ के पास रात को अजीब आवाजें आती हैं। लोग डरने लगे। कोई पानी भरने नहीं जाता था। औरतें दूर से ही लौट आतीं। बच्चों को सख्त मना था उस रास्ते पर जाने से।
रामचंद्र ने कहा, “डर से पेट नहीं भरता। पानी तो चाहिए ही।”
उसने तय किया कि रात को वही कुएँ पर जाएगा।
लोगों ने मना किया—“तू पागल है क्या? वहाँ आत्मा रहती है।”
रामचंद्र बोला, “अगर आत्मा होती, तो दिन में क्यों नहीं दिखती? अँधेरे में ही क्यों जागती है?”
रात को वह टॉर्च लेकर गया। दिल मजबूत था, कदम सीधे। उसने देखा कि हवा से पुराने पेड़ की सूखी टहनियाँ टकरा कर आवाज करती हैं। पास की झोपड़ी में रहने वाला एक बूढ़ा बीमार था और कराहता था। आवाजें वही थीं, जिन्हें लोग भूत समझ रहे थे।
रामचंद्र ने बूढ़े को पानी पिलाया, दवा दिलवाई और अगली सुबह सबको सच बताया। लोग शर्मिंदा हुए। अंधविश्वास टूट गया।
कुछ दिन बाद एक और बात फैली—“फलाँ घर में देवी आई है, वहाँ चढ़ावा चढ़ाओ, वरना अनिष्ट होगा।” लोग पैसे और अनाज लेकर दौड़ पड़े। रामचंद्र ने देखा कि एक चालाक आदमी यह सब रचा रहा है।
रामचंद्र ने भीड़ से कहा,
“देवी डर से नहीं आती। अगर ईश्वर है, तो वह सच्चाई और मेहनत में है, न कि डर फैलाने में।”
उसने उस आदमी को पकड़वाया। सच सामने आया—वह लोगों को डरा कर लूट रहा था।
अब कस्बे में लोग रामचंद्र को सिर्फ बहादुर नहीं, समझदार भी मानने लगे। वह न तलवार उठाता था, न भाषण देता था। उसकी बहादुरी सोच में थी, उसकी ताकत डर से लड़ने में थी।
एक दिन बच्चों ने उससे पूछा,
“भैया, ताकत क्या होती है?”
रामचंद्र बोला,
“मजबूत शरीर से ज़्यादा ज़रूरी है मजबूत दिमाग। जो डर से नहीं, सच से चलता है—वही सच्चा बहादुर है।”
लोग समझ गए कि धर्म रहस्य नहीं, जीवन का साहस है। अंधविश्वास कमजोरी है, और सच्चाई ताकत। रामचंद्र का जीवन यही संदेश था—हमें नरम, डरपोक सोच नहीं चाहिए, बल्कि मजबूत दिल, साफ दिमाग और साहसी जीवन चाहिए।