प्रेमचंद शहर के एक पुराने मोहल्ले में रहते थे। उम्र साठ पार कर चुकी थी, पर आँखों में अब भी करुणा और जिम्मेदारी की चमक थी। जीवन भर उन्होंने दूसरों के लिए जिया—कभी परिवार के लिए, कभी समाज के लिए, कभी ऐसे लोगों के लिए भी, जिन्हें वे ठीक से जानते तक नहीं थे। लेकिन इस भागदौड़ में वे खुद को कहीं पीछे छोड़ आए थे।
एक दिन वे अचानक बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने साफ कहा, “अब आपको सबसे पहले अपना ध्यान रखना होगा। वरना आप किसी के काम नहीं आ पाएँगे।” यह बात प्रेमचंद के दिल में उतर गई। उन्होंने पहली बार सोचा—क्या सच में मैं खुद को भूल गया हूँ?
पहले वे सुबह उठते ही दूसरों की चिंता में लग जाते थे—किसके घर में क्या कमी है, किसे मदद चाहिए, कौन दुखी है। पर अब उन्होंने निश्चय किया कि कुछ समय के लिए वे खुद पर ध्यान देंगे। सुबह टहलने जाने लगे, पुराने गीत सुनने लगे, और अपनी टूटी हुई सेहत को जोड़ने की कोशिश करने लगे।
पास ही रहने वाली छोटी बच्ची राधा रोज उनसे पूछती, “बाबा, आज किसी की मदद करने नहीं जाओगे?”
प्रेमचंद मुस्करा कर कहते, “आज पहले अपनी मदद कर रहा हूँ बेटी।”
शुरू में उन्हें अजीब लगता था। जैसे वे कोई अपराध कर रहे हों। पर धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा कि अगर साधन ही कमजोर हो जाए, तो मंज़िल तक पहुँचना कैसे संभव है? वे सोचते, “अगर मेरा मन और शरीर शुद्ध नहीं होगा, तो मैं दुनिया को क्या दूँगा?”
दिन बीतने लगे। प्रेमचंद का चेहरा फिर से चमकने लगा। आँखों में नई रोशनी थी। वे अब शांत थे, संतुलित थे। एक दिन मोहल्ले में बड़ा झगड़ा हो गया। दो परिवार आपस में कटुता से भर गए। लोग प्रेमचंद को बुलाने आए, क्योंकि वे हमेशा बीच-बचाव करते थे।
प्रेमचंद गए, पर इस बार वे थके हुए नहीं थे, बल्कि भीतर से मजबूत थे। उन्होंने दोनों परिवारों से कहा,
“दुनिया तभी सुधरेगी, जब हम खुद सुधरेंगे। अगर दिल में मैल है, तो बाहर शांति कैसे होगी?”
उनकी बातें सीधे दिल में उतर गईं। झगड़ा शांत हो गया।
शाम को प्रेमचंद अकेले बैठे सोच रहे थे—“दुनिया को अच्छा बनाने की चाह में मैं खुद को भूल गया था। पर आज समझ आया कि दुनिया मेरे भीतर से ही शुरू होती है। अगर मेरा जीवन पवित्र होगा, तो उसका असर दूसरों पर पड़ेगा।”
अब वे पहले की तरह हर समय भागते नहीं थे, पर जब भी किसी को उनकी जरूरत होती, वे पूरे मन और पूरी ताकत से मदद करते थे। लोग कहते, “प्रेमचंद पहले भी अच्छे थे, पर अब तो जैसे और भी उजले हो गए हैं।”
प्रेमचंद मन ही मन मुस्कराते और सोचते—
“हम साधन हैं, दुनिया परिणाम है। अगर साधन शुद्ध होगा, तो परिणाम अपने आप शुद्ध हो जाएगा।”