गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था, जहाँ बूढ़े गोपाल रहते थे। लोग उन्हें किसी बड़े पद या उपलब्धि के कारण नहीं जानते थे, बल्कि उनकी सादगी के कारण पहचानते थे। गोपाल न तो कभी सरपंच रहे, न ही किसी सभा में भाषण दिया, पर उनके छोटे-छोटे काम ही उनकी पहचान थे।
हर सुबह वे सबसे पहले उठते। अपने आँगन को बुहारते, फिर पास के कुएँ से पानी भरकर पड़ोस की बुज़ुर्ग अम्मा के घर रख आते, जो चल नहीं पाती थीं। किसी ने उनसे कभी यह काम करने को नहीं कहा था। वे बस चुपचाप करते और मुस्करा कर लौट आते।
दिन में जब बच्चे स्कूल जाते, तो गोपाल उन्हें रास्ता पार करवाते। कभी किसी बच्चे का जूता टूट जाए, तो वे अपनी जेब से पैसे निकालकर ठीक करवा देते। न उन्होंने इसका ढिंढोरा पीटा, न किसी से धन्यवाद की उम्मीद की।
एक दिन गाँव में बड़ा कार्यक्रम हुआ। कई नेता आए, भाषण दिए, वादे किए। लोग तालियाँ बजाते रहे। उसी भीड़ में गोपाल चुपचाप खड़े थे। अचानक एक बच्चा गिर पड़ा। नेता मंच पर थे, लोग भाषण में खोए थे, पर गोपाल दौड़कर बच्चे को उठाने पहुँचे, उसके घुटने पर दवा लगाई और उसे पानी पिलाया।
शाम को जब सब घर लौटे, तो लोगों ने देखा कि गोपाल फिर से अपने आँगन में बैठे सब्ज़ियाँ काट रहे थे—आधी अपने लिए, आधी बीमार पड़ोसी के लिए।
तब गाँव के एक युवक ने कहा,
“आज तो बड़े-बड़े लोग आए थे, पर असली बड़ा आदमी तो गोपाल ही है।”
लोग समझ गए कि महानता भाषणों में नहीं, पदों में नहीं, बल्कि रोज़ के छोटे-छोटे कामों में छिपी होती है। गोपाल कोई हीरो नहीं कहलाते थे, पर उनके साधारण काम ही बताते थे कि उनका चरित्र कितना महान था।